Friday, Oct 09

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न मूर्ति, न प्रतिमा, पालने में विराजती हैं मां अलोप शंकरी, नवरात्रि में उमड़ते हैं भक्त

Maa Alop Shankari Temple: प्रयागराज को तीर्थराज के साथ-साथ आस्था और श्रद्धा की नगरी भी कहा जाता है। यहां स्थित मां अलोप शंकरी मंदिर अपनी अनोखी धार्मिक परंपरा के लिए विशेष पहचान रखता है। अलोपीबाग में बने इस मंदिर में माता की कोई पारंपरिक मूर्ति या प्रतिमा नहीं है, बल्कि गर्भगृह में विराजमान दिव्य पालने की पूजा की जाती है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, यह मंदिर देश के 51 शक्तिपीठों में शामिल है। यही वजह है कि यहां सालभर श्रद्धालु दर्शन के लिए पहुंचते हैं, जबकि नवरात्रि के दौरान मंदिर में भक्तों की भीड़ और बढ़ जाती है।

माता सती के हाथ का पंजा यहां हुआ था अलोप

मां अलोप शंकरी मंदिर से जुड़ी मान्यता माता सती की पौराणिक कथा से जुड़ी हुई है। कथा के अनुसार, माता सती अपने पिता दक्ष प्रजापति के यज्ञ में भगवान शिव का अपमान होने से दुखी हो गई थीं। इसी पीड़ा में उन्होंने योगाग्नि से अपने प्राण त्याग दिए। इसके बाद भगवान शिव माता सती के पार्थिव शरीर को लेकर विचरण करने लगे।

धार्मिक मान्यता के मुताबिक, सृष्टि को इस स्थिति से बचाने के लिए भगवान विष्णु ने सुदर्शन चक्र से माता सती के शरीर के अंग अलग किए। मान्यता है कि जिन स्थानों पर उनके अंग गिरे, वहां शक्तिपीठ स्थापित हुए। इसी कथा से प्रयागराज के मां अलोप शंकरी मंदिर का संबंध भी बताया जाता है। स्थानीय धार्मिक मान्यता के अनुसार, जिस स्थान पर आज यह मंदिर है, वहां माता सती के हाथ का पंजा गिरा था और वह अदृश्य यानी अलोप हो गया। इसी वजह से इस स्थान का नाम अलोप शंकरी पड़ा। श्रद्धालु इस धाम को शक्तिपीठ के रूप में पूजते हैं और यहां आकर माता का आशीर्वाद मांगते हैं।

न मूर्ति, न प्रतिमा, दिव्य पालने की होती है पूजा

मां अलोप शंकरी मंदिर की सबसे खास बात यहां की पूजा परंपरा है। आमतौर पर मंदिरों में देवी-देवताओं की मूर्तियों के दर्शन होते हैं, लेकिन इस मंदिर के गर्भगृह में माता की पारंपरिक प्रतिमा नहीं है। यहां स्थापित दिव्य पालने को ही माता के स्वरूप के रूप में पूजने की परंपरा है। श्रद्धालु पालने के दर्शन करते हैं, पूजा-अर्चना करते हैं और अपनी मनोकामनाएं माता के सामने रखते हैं। भक्तों का विश्वास है कि सच्चे मन से की गई प्रार्थना मां तक जरूर पहुंचती है। मंदिर परिसर में मां दुर्गा के नौ स्वरूपों के साथ काल भैरव, मां शीतला और भगवान हनुमान के भी दर्शन किए जा सकते हैं। इस कारण यहां आने वाले श्रद्धालु पालने की पूजा के साथ अन्य देवी-देवताओं का आशीर्वाद भी लेते हैं।

मनोकामना पूरी होने पर कुंड में चढ़ाते हैं दूध, दही और मेवे

मंदिर परिसर में एक पवित्र कुंड भी स्थित है, जिसे लेकर श्रद्धालुओं के बीच विशेष मान्यता प्रचलित है। मान्यता है कि जिन भक्तों की मनोकामना पूरी हो जाती है, वे कुंड को दूध, दही और मेवों से भरवाकर माता के प्रति अपनी श्रद्धा और आभार व्यक्त करते हैं। यह परंपरा भक्तों के विश्वास से जुड़ी हुई है। मंदिर में विवाह के बाद नवदंपती भी सुखी वैवाहिक जीवन की कामना लेकर पहुंचते हैं। वहीं, परिवार में पहली संतान के जन्म के बाद बच्चे का मुंडन संस्कार कराने की परंपरा भी बताई जाती है। श्रद्धालु अपनी मनोकामना पूरी होने पर विशेष पूजा-अर्चना करते हैं और माता के प्रति आभार जताते हैं। नवरात्रि के दौरान मंदिर में आने वाले भक्त चुनरी, नारियल, फूल और फल अर्पित करते हैं। इन दिनों माता के दर्शन के लिए दूर-दराज के क्षेत्रों से भी श्रद्धालु पहुंचते हैं। मंदिर परिसर में पूजा-अर्चना और दर्शन का सिलसिला चलता रहता है।

नवरात्रि में हजारों श्रद्धालु पहुंचते हैं दर्शन के लिए

मां अलोप शंकरी मंदिर प्रयागराज के प्रमुख धार्मिक स्थलों में गिना जाता है। सामान्य दिनों में भी यहां भक्त दर्शन के लिए आते हैं, लेकिन नवरात्रि के नौ दिनों में मंदिर में विशेष रौनक देखने को मिलती है। श्रद्धालु पालने के दर्शन कर परिवार की सुख-समृद्धि, खुशहाली और मनोकामनाओं की पूर्ति के लिए प्रार्थना करते हैं। मंदिर की पहचान उसकी अनोखी पूजा पद्धति और माता सती से जुड़ी धार्मिक मान्यता के कारण बनी हुई है। यहां माता की मूर्ति के बजाय दिव्य पालने की पूजा की जाती है। यही परंपरा मां अलोप शंकरी धाम को विशेष बनाती है और हर साल बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं को अपनी ओर आकर्षित करती है।

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