Friday, Oct 02

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Panchbali Bhog: श्राद्ध में सबसे पहले किसे दें भोजन? जानें पंचबली का सही क्रम

Panchbali Bhog: पितृ पक्ष में श्राद्ध और तर्पण के साथ पंचबली भोग की परंपरा भी महत्वपूर्ण मानी जाती है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार श्राद्ध के दौरान बनाए गए भोजन का कुछ हिस्सा अलग-अलग जीवों और देवताओं को अर्पित किया जाता है। इसे पंचबली भोग कहा जाता है। इसमें गाय, कौवा, कुत्ता, चींटी और देवताओं के लिए भोजन निकाला जाता है। माना जाता है कि इस परंपरा के जरिए पूर्वजों के प्रति श्रद्धा और सम्मान प्रकट किया जाता है। आइए जानते हैं पंचबली भोग में भोजन अर्पित करने का पारंपरिक क्रम क्या माना जाता है।

पंचबली भोग में सबसे पहले किसे दें भोजन?

पितृ पक्ष में श्राद्ध कर्म पूरा होने के बाद पंचबली के लिए भोजन का अंश निकाला जाता है। धार्मिक परंपरा में सबसे पहले देव बलि और गौ-ग्रास का विधान बताया गया है। इसके बाद गाय को भोजन कराया जाता है। सनातन परंपरा में गाय को विशेष रूप से पूजनीय माना गया है और उसमें देवी-देवताओं का वास माना जाता है।

गाय को भोजन कराने के बाद कौवे के लिए अन्न निकाला जाता है। धार्मिक मान्यताओं में कौवे को पितरों से जोड़कर देखा जाता है। इसलिए श्राद्ध के दौरान कौवे को भोजन कराना पितरों के प्रति श्रद्धा व्यक्त करने की एक प्रमुख परंपरा मानी जाती है।

कुत्ते और चींटी को भोजन देने की परंपरा

पंचबली में गाय और कौवे के बाद कुत्ते के लिए भोजन निकालने की परंपरा बताई गई है। इसे श्वान बलि कहा जाता है। धार्मिक मान्यताओं में कुत्ते का संबंध यमराज से माना जाता है। यही वजह है कि श्राद्ध के दौरान कुत्ते को भोजन कराने को भी विशेष महत्व दिया जाता है।

इसके बाद चींटियों के लिए भोजन का हिस्सा अलग किया जाता है। इसे घर के बाहर या उचित स्थान पर रखा जाता है। मान्यता है कि छोटे-से-छोटे जीव को भोजन उपलब्ध कराने से जीव-जगत के प्रति करुणा और सेवा का भाव प्रकट होता है।

देवताओं को भी अर्पित किया जाता है अन्न

पंचबली की परंपरा में देवताओं के लिए भी भोजन का अंश निकाला जाता है। इसे देव बलि कहा जाता है और इसे परंपरा के अनुसार अग्नि या अन्य निर्धारित विधि से अर्पित किया जाता है।

इस तरह पंचबली भोग में गाय, कौवा, कुत्ता, चींटी और देवताओं के लिए भोजन निकालने की परंपरा है। अलग-अलग क्षेत्रों और परिवारों में इसकी विधि या क्रम में कुछ अंतर भी हो सकता है। इसलिए श्राद्ध कर्म करते समय अपने परिवार की परंपरा और स्थानीय धार्मिक विधि का पालन करना उचित माना जाता है।