Pitru Aarti in Hindi: हिंदू धर्म में पितृ पक्ष का समय पूर्वजों के प्रति श्रद्धा और कृतज्ञता प्रकट करने के लिए विशेष माना जाता है। इन दिनों लोग अपने पितरों की आत्मिक शांति के लिए उनकी मृत्यु तिथि पर श्राद्ध, तर्पण और पिंडदान जैसे धार्मिक कर्म करते हैं। मान्यता है कि इस अवधि में पूर्वजों का स्मरण करने और उनके निमित्त पूजा-पाठ करने से उनका आशीर्वाद प्राप्त होता है।
श्राद्ध कर्म के साथ पितरों का पूजन और आरती करना भी धार्मिक परंपरा का हिस्सा माना जाता है। आरती के दौरान पूर्वजों को नमन कर परिवार की सुख-समृद्धि, शांति और मंगल की प्रार्थना की जाती है। आइए जानते हैं पितृ आरती की विधि और संपूर्ण आरती।
श्री पितृ जी की आरती
जय जय पितृ जी महाराज, मैं शरण पड़यो हूं थारी।
शरण पड़यो हूं थारी बाबा, शरण पड़यो हूं थारी॥
जय जय पितृ जी महाराज।
आप ही रक्षक आप ही दाता, आप ही खेवनहारे।
मैं मूरख हूं कछु नहि जाणू, आप ही हो रखवारे॥
जय जय पितृ जी महाराज।
आप खड़े हैं हरदम हर घड़ी, करने मेरी रखवारी।
हम सब जन हैं शरण आपकी, है ये अरज गुजारी॥
जय जय पितृ जी महाराज।
देश और परदेश सब जगह, आप ही करो सहाई।
काम पड़े पर नाम आपको, लगे बहुत सुखदाई॥
जय जय पितृ जी महाराज।
भक्त सभी हैं शरण आपकी, अपने सहित परिवार।
रक्षा करो आप ही सबकी, रटूं मैं बारम्बार॥
जय जय पितृ जी महाराज।
पितरों की आरती करने का तरीका
जिस दिन परिवार में श्राद्ध तिथि हो, उस दिन सुबह स्नान करके स्वच्छ वस्त्र धारण करें। इसके बाद परिवार की परंपरा के अनुसार श्राद्ध, तर्पण और पिंडदान आदि कर्म पूरे करें। इन कार्यों के बाद पूजा स्थल को साफ कर घी का दीपक और धूप जलाएं।
अब मन को शांत करके अपने पितरों का स्मरण करें। श्रद्धा के अनुसार ‘ॐ पितृ देवताभ्यो नमः’ या ‘ॐ सर्व पितृ देवताभ्यो नमः’ मंत्र का जाप किया जा सकता है। इसके बाद पितृ जी की आरती श्रद्धापूर्वक करें। आरती समाप्त होने पर पूर्वजों को नमन करें और परिवार की सुख-शांति व समृद्धि के लिए प्रार्थना करें।
पितृ आरती का धार्मिक महत्व
धार्मिक मान्यताओं में पितृ पक्ष के दौरान पूर्वजों का स्मरण और उनके निमित्त किए जाने वाले कर्मों को महत्वपूर्ण बताया गया है। श्राद्ध, तर्पण और पिंडदान के साथ आरती करके पितरों से परिवार पर कृपा बनाए रखने की प्रार्थना की जाती है।
पितरों की आरती को पूर्वजों के प्रति सम्मान और आभार व्यक्त करने का एक माध्यम माना जाता है। हालांकि धार्मिक कर्मकांड हमेशा अपनी पारिवारिक परंपरा और मान्यताओं के अनुसार करना उचित माना जाता है।

