नई दिल्ली: पितृ पक्ष के दौरान पूर्वजों की आत्मा की शांति और उनके प्रति श्रद्धा व्यक्त करने के लिए श्राद्ध कर्म किए जाते हैं। साल 2026 में दशमी श्राद्ध आज यानी 5 अक्टूबर, सोमवार को मनाया जा रहा है। इसे दसमी श्राद्ध भी कहा जाता है। इस अवसर पर परिवार के लोग अपने पितरों का स्मरण करते हुए तर्पण, पिंडदान और अन्य धार्मिक कर्म करते हैं। धार्मिक मान्यताओं में श्राद्ध का सबसे महत्वपूर्ण आधार श्रद्धा और भाव को माना गया है।
दशमी श्राद्ध का शुभ मुहूर्त
दशमी श्राद्ध के दिन दोपहर के समय श्राद्ध कर्म करना विशेष माना जाता है। आज के प्रमुख मुहूर्त इस प्रकार हैं:
- कुतुप मुहूर्त: सुबह 11:46 बजे से दोपहर 12:33 बजे तक
- रौहिण मुहूर्त: दोपहर 12:33 बजे से 1:20 बजे तक
- अपराह्न काल: दोपहर 1:20 बजे से 3:41 बजे तक
इनमें कुतुप और रौहिण मुहूर्त की अवधि 47-47 मिनट है, जबकि अपराह्न काल करीब 2 घंटे 21 मिनट का रहेगा।
दशमी श्राद्ध की विधि क्या है?
श्राद्ध के दिन सुबह स्नान करके स्वच्छ वस्त्र धारण करें और पूजा या श्राद्ध कर्म के स्थान को साफ करें। इसके बाद अपने पितरों का ध्यान करते हुए श्राद्ध का संकल्प लिया जाता है।
इसके बाद तर्पण किया जाता है। परंपरा के अनुसार जल में काले तिल मिलाकर पितरों को अर्पित किया जाता है। तर्पण करते समय पूर्वज का नाम और गोत्र स्मरण करने की परंपरा है। इसके बाद परिवार की मान्यताओं के अनुसार पिंडदान किया जाता है। पिंड बनाने में आमतौर पर चावल, तिल और अन्य पूजन सामग्री का प्रयोग किया जाता है।
भोजन और दान का भी है महत्व
श्राद्ध कर्म के बाद भोजन और दान करने की परंपरा भी प्रचलित है। कई परिवार अपनी धार्मिक परंपरा के अनुसार ब्राह्मणों को भोजन कराते हैं। इसके अलावा जरूरतमंद लोगों को भोजन, वस्त्र या सामर्थ्य के अनुसार आवश्यक सामान दान किया जा सकता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार पितरों के नाम पर किया गया दान पुण्यकारी माना जाता है।
किन पितरों का किया जाता है दशमी श्राद्ध?
दशमी श्राद्ध मुख्य रूप से उन पूर्वजों के लिए किया जाता है, जिनका निधन दशमी तिथि को हुआ हो। इसमें शुक्ल पक्ष और कृष्ण पक्ष, दोनों की दशमी तिथि शामिल हो सकती हैं।
वहीं, यदि किसी व्यक्ति को अपने पूर्वज की मृत्यु तिथि मालूम नहीं है, तो पितृ पक्ष की सर्वपितृ अमावस्या पर श्राद्ध करने की परंपरा भी बताई गई है। अलग-अलग परिवारों और क्षेत्रों में श्राद्ध से जुड़े नियमों में अंतर हो सकता है, इसलिए अपनी पारिवारिक परंपरा और स्थानीय मान्यता के अनुसार कर्म करना उचित माना जाता है।

