Prostate Cancer Awareness: वर्ल्ड कैंसर रिसर्च फंड के मुताबिक, प्रोस्टेट कैंसर पुरुषों में दुनिया का दूसरा और कुल मिलाकर चौथा सबसे आम कैंसर है। इसके बावजूद पुरुषों की सेहत में प्रोस्टेट हेल्थ पर अपेक्षाकृत कम चर्चा होती है। शुरुआती प्रोस्टेट कैंसर अक्सर बिना स्पष्ट लक्षणों के विकसित होता है, इसलिए जोखिम को समझना और सही समय पर डॉक्टर से सलाह लेना जरूरी है।
अगर पिता या भाई को प्रोस्टेट कैंसर रहा है, तो जोखिम बढ़ सकता है। कम उम्र में रिश्तेदार के प्रभावित होने या परिवार में कई करीबी सदस्यों को यह बीमारी होने पर जोखिम ज्यादा हो सकता है। ऐसे पुरुषों को औसत जोखिम वाले लोगों की तुलना में पहले स्क्रीनिंग पर डॉक्टर से चर्चा करनी चाहिए। उम्र, फैमिली हिस्ट्री, जातीय पृष्ठभूमि, पुराने PSA परिणाम और अन्य जोखिम कारकों के आधार पर डॉक्टर जांच का समय तय कर सकते हैं। कुछ परिवारों में आनुवंशिक बदलाव भी जोखिम बढ़ा सकते हैं, ऐसे मामलों में जेनेटिक काउंसलिंग या टेस्टिंग पर विचार किया जा सकता है।
कोई भी डाइट प्रोस्टेट कैंसर को पूरी तरह रोकने की गारंटी नहीं देती। हालांकि, सब्जियों, फलों, साबुत अनाज, दालों और कम प्रोसेस्ड खाद्य पदार्थों से भरपूर आहार बेहतर विकल्प है। प्रोसेस्ड मीट, अत्यधिक प्रोसेस्ड फूड और सैचुरेटेड फैट वाले भोजन को सीमित करना चाहिए। स्वस्थ वजन बनाए रखना, नियमित व्यायाम, धूम्रपान से बचना और शराब सीमित करना भी जरूरी है। प्रोस्टेट कैंसर रोकने के लिए फिलहाल कोई सप्लीमेंट प्रमाणित नहीं है।
हर पुरुष के लिए स्क्रीनिंग की एक ही उम्र तय नहीं है। औसत जोखिम वाले पुरुषों में आमतौर पर 50 वर्ष के आसपास PSA स्क्रीनिंग पर चर्चा शुरू की जा सकती है। ज्यादा जोखिम वाले पुरुषों में यह 45 वर्ष या उससे पहले भी शुरू हो सकती है। खासकर जिनके फर्स्ट-डिग्री रिश्तेदार को कम उम्र में प्रोस्टेट कैंसर हुआ हो, उन्हें डॉक्टर से जल्दी चर्चा करनी चाहिए। PSA टेस्ट हर व्यक्ति के लिए सालाना जरूरी नहीं है; जांच का अंतर उम्र, शुरुआती PSA स्तर और अन्य जोखिमों पर निर्भर करता है।
PSA एक साधारण ब्लड टेस्ट है, जो प्रोस्टेट कोशिकाओं द्वारा बनाए जाने वाले प्रोस्टेट-स्पेसिफिक एंटीजन को मापता है। PSA बढ़ना अपने आप में कैंसर का प्रमाण नहीं है। प्रोस्टेट बढ़ने, प्रोस्टेट में सूजन, यूरिन इंफेक्शन, कुछ दवाओं और अन्य कारणों से भी PSA बढ़ सकता है।
PSA ज्यादा आने पर डॉक्टर टेस्ट दोबारा करा सकते हैं या आगे जांच की सलाह दे सकते हैं। जरूरत पड़ने पर प्रोस्टेट MRI या बायोप्सी भी की जा सकती है। इसलिए PSA को अकेले कैंसर की पुष्टि मानना सही नहीं है।
BPH यानी बेनाइन प्रोस्टेटिक हाइपरप्लासिया और प्रोस्टेट कैंसर अलग-अलग स्थितियां हैं, हालांकि दोनों से पेशाब संबंधी परेशानी और PSA बढ़ सकता है। डॉक्टर लक्षणों, PSA के स्तर और समय के साथ उसमें बदलाव, शारीरिक जांच और इमेजिंग को देखते हैं।
डिजिटल रेक्टल एग्जाम से प्रोस्टेट के आकार और संदिग्ध हिस्सों की जानकारी मिल सकती है, लेकिन इससे अकेले कैंसर की पुष्टि नहीं होती। मल्टीपैरामेट्रिक MRI संदिग्ध हिस्सों की पहचान में मदद करती है। कैंसर का संदेह रहने पर आमतौर पर बायोप्सी की जरूरत होती है।
शुरुआती प्रोस्टेट कैंसर में अक्सर कोई लक्षण नहीं होता। लक्षण आने पर पेशाब शुरू करने में परेशानी, कमजोर या रुक-रुककर धार, रात में बार-बार पेशाब आना, अचानक तेज इच्छा होना या ब्लैडर पूरी तरह खाली न होने का एहसास शामिल हो सकता है।
पेशाब या वीर्य में खून, कमर के निचले हिस्से, कूल्हे या पेल्विस में लगातार दर्द और यौन स्वास्थ्य से जुड़ी अस्पष्ट समस्याओं की भी जांच करानी चाहिए। हालांकि, ये लक्षण जरूरी नहीं कि कैंसर के कारण ही हों। लगातार या बढ़ती समस्या को केवल उम्र का असर मानकर नजरअंदाज नहीं करना चाहिए।
हर मामले में तुरंत इलाज जरूरी नहीं होता। कुछ प्रोस्टेट कैंसर छोटे, धीमी गति से बढ़ने वाले और कम जोखिम वाले होते हैं। ऐसे चुनिंदा मरीजों में एक्टिव सर्विलांस सुरक्षित विकल्प हो सकता है। इसमें नियमित PSA टेस्ट, क्लिनिकल जांच, इमेजिंग और जरूरत पड़ने पर दोबारा बायोप्सी की जाती है।
अगर बीमारी के बढ़ने के संकेत मिलते हैं तो इलाज शुरू किया जा सकता है। एक्टिव सर्विलांस का मतलब कैंसर को नजरअंदाज करना नहीं, बल्कि डॉक्टर की निगरानी में रखना है। फैसला कैंसर की ग्रेड, स्टेज, PSA, MRI और बायोप्सी रिपोर्ट, उम्र, स्वास्थ्य और मरीज की पसंद पर निर्भर करता है।
इलाज कैंसर के जोखिम, स्टेज और ग्रेड के साथ मरीज की उम्र, स्वास्थ्य और प्राथमिकताओं पर निर्भर करता है। विकल्पों में कम जोखिम वाले मामलों में एक्टिव सर्विलांस, सर्जरी और रेडिएशन थेरेपी शामिल हैं।
रेडिएशन बाहरी तौर पर या कुछ मामलों में ब्रैकीथेरेपी के जरिए दी जा सकती है, जिसमें रेडियोएक्टिव स्रोत प्रोस्टेट के भीतर या उसके पास रखे जाते हैं। कुछ मरीजों को जोखिम के अनुसार रेडिएशन के साथ हार्मोन थेरेपी भी दी जा सकती है। यूरोलॉजी, रेडिएशन ऑन्कोलॉजी और अन्य विशेषज्ञों से चर्चा कर व्यक्तिगत इलाज तय करना बेहतर होता है।
प्रोस्टेट कैंसर का इलाज पेशाब पर नियंत्रण और यौन स्वास्थ्य को प्रभावित कर सकता है, हालांकि असर व्यक्ति और उपचार के अनुसार अलग-अलग होता है। सर्जरी के बाद कुछ पुरुषों में अस्थायी या लंबे समय तक पेशाब नियंत्रित करने में परेशानी और इरेक्टाइल डिसफंक्शन हो सकता है। रेडिएशन से भी यूरिन, आंत और यौन स्वास्थ्य संबंधी दुष्प्रभाव हो सकते हैं।
हार्मोन थेरेपी से हॉट फ्लैश, कामेच्छा में कमी और थकान जैसी समस्याएं हो सकती हैं। पेल्विक-फ्लोर एक्सरसाइज, कॉन्टिनेंस सपोर्ट, इरेक्टाइल-फंक्शन उपचार और काउंसलिंग से कई समस्याओं को संभालने में मदद मिल सकती है। इलाज से पहले इन पहलुओं पर डॉक्टर से बात करना जरूरी है।
परिवार का सबसे उपयोगी सहयोग मरीज को जानकारीपूर्ण, व्यवस्थित और भावनात्मक रूप से मजबूत बनाए रखना है, बिना उसके लिए फैसले लिए। परिवार डॉक्टर की अपॉइंटमेंट, PSA रिपोर्ट और दवाओं का रिकॉर्ड रखने में मदद कर सकता है और जरूरत पड़ने पर अस्पताल भी साथ जा सकता है।
इलाज के दौरान अपॉइंटमेंट, आने-जाने, भोजन, व्यायाम और रिकवरी में मदद उपयोगी हो सकती है। पेशाब की समस्या, यौन स्वास्थ्य, चिंता और इलाज के विकल्पों पर खुलकर बात करना भी जरूरी है। मरीज की पसंद और निजता का सम्मान करते हुए जरूरत पड़ने पर मनोवैज्ञानिक या काउंसलिंग सहायता लेने के लिए प्रोत्साहित किया जा सकता है।
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