Shiv Sena Symbol Dispute: शिवसेना के नाम और चुनाव चिह्न तीर-कमान से जुड़े विवाद पर बुधवार को सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई हुई। इस दौरान चुनाव आयोग के फैसले का समर्थन करते हुए वरिष्ठ अधिवक्ता एन.के. कौल ने पार्टी के संविधान और आंतरिक लोकतंत्र से जुड़े कई कानूनी तर्क रखे। कोर्ट ने मामले की सुनवाई अब गुरुवार दोपहर 2 बजे तक के लिए टाल दी है।
एन.के. कौल ने पार्टी संविधान का दिया हवाला
सुनवाई के दौरान एन.के. कौल ने 'अर्जुन सिंह' मामले के फैसले का हवाला देते हुए राजनीतिक दलों में आंतरिक लोकतंत्र की अहमियत पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि 1990 के दशक से चुनाव आयोग राजनीतिक दलों से यह सुनिश्चित करने को कहता रहा है कि उनके पार्टी संविधान लोकतांत्रिक मूल्यों के अनुरूप हों। कौल ने दलील दी कि शिवसेना ने 2011 में लोकतांत्रिक सिद्धांतों के तहत अपने संविधान में बदलाव किए थे। इसके बाद 2018 में भी पार्टी संविधान में संशोधन किया गया था। हालांकि, चुनाव आयोग के दस्तावेजों के मुताबिक 2018 के संशोधित संविधान की प्रति आयोग को नहीं सौंपी गई थी।
चुनाव आयोग के फैसले का किया बचाव
कौल ने याचिकाकर्ताओं की ओर से चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर उठाए गए सवालों का भी जवाब दिया। उन्होंने कहा कि चुनाव आयोग एक निष्पक्ष और वैध संवैधानिक प्राधिकरण है और उसके फैसले को किसी पूर्वव्यापी प्रभाव वाला फैसला बताना सही नहीं है। उनका तर्क था कि अदालत को चुनाव आयोग के फैसले में तभी हस्तक्षेप करना चाहिए, जब फैसला पूरी तरह तर्कहीन हो। उनके मुताबिक, इस मामले में आयोग ने सभी पहलुओं पर विचार करने के बाद अपना फैसला लिया है।
बेंच ने 10वीं अनुसूची का किया जिक्र
सुनवाई के दौरान जस्टिस जे. बागची ने टिप्पणी करते हुए कहा कि कई पुराने फैसले 10वीं अनुसूची यानी एंटी-डिफेक्शन कानून में संशोधन से पहले के हैं। बेंच ने 'सुभाष देसाई' फैसले का भी जिक्र किया और कहा कि उसमें पुराने फैसलों के 10वीं अनुसूची के प्रावधानों से पहले के होने का रिकॉर्ड है। कोर्ट ने यह सवाल भी उठाया कि क्या चुनाव आयोग को दूसरे विकल्पों को प्राथमिकता देनी चाहिए थी या विधायी बहुमत का परीक्षण ही एकमात्र रास्ता था।
आयोग की प्रक्रिया की होगी समीक्षा
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि वह सीधे तौर पर चुनाव आयोग के फैसले के गुण-दोष में हस्तक्षेप नहीं कर सकती, लेकिन फैसले तक पहुंचने की प्रक्रिया की समीक्षा की जा सकती है।
शिवसेना के चुनाव चिह्न से जुड़ी ऐतिहासिक भावनाओं और बड़ी संख्या में कार्यकर्ताओं की निष्ठा को देखते हुए कोर्ट यह परख रहा है कि क्या चुनाव आयोग ने फैसला लेते समय सभी संभावित परिणामों और पहलुओं पर पर्याप्त विचार किया था। मामले में अब कल दोपहर 2 बजे फिर सुनवाई होगी।
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