Switzerland: यूरोप में बढ़ती गर्मी का स्विट्जरलैंड के ग्लेशियरों पर गंभीर असर पड़ा है. GLAMOS के मुताबिक, 2026 में स्विस ग्लेशियरों ने 5% से ज्यादा बर्फ खो दी, जबकि पिछले पांच वर्षों में कुल बर्फ का नुकसान करीब 20% तक पहुंच गया है. कुछ ग्लेशियरों की जीभ यानी निचले हिस्से की मोटाई गर्मियों में 10 मीटर तक घटी. वैज्ञानिक मैथियास हुस ने कहा कि ग्लेशियरों को तेजी से गायब होते देखना चिंताजनक है.
कम बर्फ और रिकॉर्ड गर्मी बनी वजह
2026 की शुरुआत में आल्प्स में बर्फ सामान्य से कम थी, जिससे ग्लेशियरों को सूरज की गर्मी से बचाने वाली प्राकृतिक परत कमजोर रही. इसके बाद मई से सितंबर तक भीषण गर्मी पड़ी. लंबे समय तक 4,000 मीटर से ऊपर भी तापमान हिमांक से ऊपर रहा, जिससे ऊंचाई वाले ग्लेशियर भी पिघलने लगे. यूरोप वैश्विक औसत से करीब दोगुनी तेजी से गर्म हो रहा है, जिसका असर आल्प्स पर दिख रहा है.
ग्लेशियर क्यों हैं जरूरी?
ग्लेशियर प्राकृतिक जल भंडार की तरह काम करते हैं. इनके पिघलने से हाइड्रोपावर और खेती के लिए पानी प्रभावित हो सकता है, जबकि पहाड़ी क्षेत्रों में बाढ़ और भूस्खलन का खतरा भी बढ़ता है. जुलाई से सितंबर 2026 के बीच स्विस ग्लेशियरों से करीब 2.2 ट्रिलियन लीटर पानी निकला, जो देश की सालाना घरेलू खपत के लगभग चार गुना है. स्विट्जरलैंड की आधे से अधिक बिजली जलविद्युत से आती है और देश से डेन्यूब, पो, राइन और रोन जैसी प्रमुख नदियां निकलती हैं.
हिमालय में भी बढ़ रहा संकट
ग्लेशियरों का नुकसान सिर्फ यूरोप तक सीमित नहीं है. ICIMOD के अनुसार 1990 से 2020 के बीच हिंदू कुश हिमालय के ग्लेशियरों का क्षेत्रफल करीब 12% और अनुमानित बर्फ भंडार 9% घटा. वर्ष 2000 के बाद बर्फ पिघलने की दर लगभग दोगुनी हुई है. वैज्ञानिकों के मुताबिक CO₂ उत्सर्जन कम करके जलवायु को स्थिर करना जरूरी है, हालांकि स्विस आल्प्स के कई ग्लेशियरों को बचाने की चुनौती अब बेहद गंभीर हो चुकी है.
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