Saturday, Oct 03

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बॉन्ड यील्ड ने बढ़ाई दुनिया की टेंशन, 20 साल बाद फिर मंडराया बड़ा आर्थिक खतरा

US Bond Yield Impact on India: अमेरिकी बॉन्ड यील्ड में लगातार बढ़ोतरी ने वैश्विक वित्तीय बाजारों की चिंता बढ़ा दी है। अमेरिका की नीतियों का असर दुनियाभर में दिखाई देता है और यील्ड बढ़ने पर भारत जैसे उभरते बाजारों में भी दबाव बढ़ता है।

बॉन्ड यील्ड क्या होती है?

सरकार जब पैसे जुटाने के लिए सरकारी बॉन्ड जारी करती है, तो उस पर तय ब्याज को कूपन रेट कहा जाता है। बॉन्ड से मिलने वाले वास्तविक रिटर्न को यील्ड कहते हैं। बॉन्ड की कीमत और यील्ड विपरीत दिशा में चलती हैं। कीमत घटने पर यील्ड बढ़ती है। अमेरिकी बॉन्ड को सुरक्षित निवेश माना जाता है, इसलिए यील्ड बढ़ने पर वैश्विक पूंजी अमेरिका की ओर आकर्षित होती है।

10, 20 और 30 साल की यील्ड क्यों अहम?

टेन्योर बताता है कि सरकार कितने समय के लिए कर्ज ले रही है। 10 साल की यील्ड वैश्विक वित्तीय बाजार का प्रमुख बेंचमार्क है और होम-कार लोन समेत कॉर्पोरेट कर्ज की दरों को प्रभावित करती है। 20 और 30 साल की यील्ड लंबी अवधि के कर्ज और निवेश के जोखिम को दर्शाती हैं। 30 साल की यील्ड बढ़ना लंबे समय तक महंगाई और ब्याज दर ऊंची रहने की आशंका का संकेत माना जाता है।

1 अक्टूबर 2026 तक अमेरिकी यील्ड: 10 साल 5.30%, 20 साल 5.50% और 30 साल 5.62%। पिछले तीन महीनों में करीब 50 बेसिस पॉइंट और एक साल में 60-90 बेसिस पॉइंट की बढ़ोतरी हुई। 10 साल की यील्ड का 5.30% स्तर 2007 और 2002 के आसपास देखा गया था, जबकि 30 साल की यील्ड 5.60% से ऊपर पहुंचकर 21वीं सदी के रिकॉर्ड स्तर पर है।

क्यों बढ़ रही अमेरिकी यील्ड?

ऊंची अमेरिकी ब्याज दरें और सरकार का बढ़ता कर्ज प्रमुख वजह हैं। बजट घाटा बढ़ने से सरकार बड़ी मात्रा में नए बॉन्ड जारी कर रही है। ज्यादा सप्लाई और कम मांग से बॉन्ड की कीमत गिरती है और यील्ड बढ़ती है।

भारत पर क्या असर?

ऊंची अमेरिकी यील्ड विदेशी निवेशकों को भारतीय शेयरों से पैसा निकालकर अमेरिकी बॉन्ड में निवेश करने के लिए आकर्षित कर सकती है। डॉलर की मांग बढ़ने से रुपया कमजोर होता है, जिससे कच्चा तेल और दूसरे आयात महंगे होते हैं। इसका असर महंगाई और लोन EMI पर पड़ सकता है। यील्ड बढ़ने से कंपनियों की कॉस्ट ऑफ कैपिटल भी बढ़ती है और शेयर बाजार के ऊंचे वैल्युएशन पर दबाव बनता है। भारत इससे निपटने के लिए विदेशी मुद्रा भंडार के इस्तेमाल, घरेलू म्यूचुअल फंड और खुदरा निवेश को मजबूत करने तथा रुपये में द्विपक्षीय व्यापार बढ़ाने जैसी रणनीतियां अपना सकता है।

भारतीय बॉन्ड बाजार की स्थिति

भारत का 10 साल का बेंचमार्क बॉन्ड करीब 7.16% और 30 साल का बॉन्ड करीब 7.65% पर है। केंद्र और राज्य सरकारें वित्तीय जरूरतों व इंफ्रास्ट्रक्चर के लिए G-Secs और SDLs जारी करती हैं, जबकि RBI इनकी नीलामी का प्रबंधन करता है। हालांकि अमेरिकी यील्ड भारतीय बाजार पर दबाव डाल रही है, शेयर बाजार की गिरावट की यह अकेली वजह नहीं है। पश्चिम एशिया के तनाव के बीच ब्रेंट क्रूड $100 प्रति बैरल से ऊपर है और भारत अपनी जरूरत का 85% से अधिक तेल आयात करता है। महंगा तेल महंगाई और कंपनियों के मुनाफे दोनों को प्रभावित कर सकता है।

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