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खामेनेई के अंतिम संस्कार में UAE, बहरीन और कुवैत क्यों रहे नदारद? खाड़ी की बदलती कूटनीति को समझिए

Ali Khamenei Funeral: ईरान के पूर्व सर्वोच्च नेता Ali Khamenei के अंतिम संस्कार में दुनिया के कई देशों के प्रतिनिधिमंडलों ने हिस्सा लिया। भारत से केंद्रीय मंत्री, चीन का विशेष दूत, रूस के वरिष्ठ प्रतिनिधि, तुर्किये के उपराष्ट्रपति और पाकिस्तान का प्रतिनिधिमंडल तेहरान पहुंचे। मध्य एशिया के कई देशों ने भी श्रद्धांजलि अर्पित की। हालांकि, संयुक्त अरब अमीरात (UAE), बहरीन और कुवैत की गैरमौजूदगी ने सबसे अधिक राजनीतिक चर्चा बटोरी।

GCC और ईरान के रिश्तों की पृष्ठभूमि

1981 में स्थापित गल्फ कोऑपरेशन काउंसिल (GCC) में सऊदी अरब, UAE, कुवैत, कतर, बहरीन और ओमान शामिल हैं। इसे क्षेत्रीय सहयोग और सुरक्षा के उद्देश्य से बनाया गया था। ईरान शिया बहुल देश है, जबकि GCC के अधिकांश सदस्य सुन्नी बहुल हैं। धार्मिक मतभेदों के साथ-साथ क्षेत्रीय प्रभाव को लेकर भी दोनों पक्षों के बीच लंबे समय से प्रतिस्पर्धा और अविश्वास बना रहा है।

बहरीन में शिया आबादी अधिक है, लेकिन शासन सुन्नी अल-खलीफा परिवार के हाथों में है। बहरीन लंबे समय से ईरान पर अपने आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप के आरोप लगाता रहा है। वहीं UAE और ईरान के बीच अबू मूसा तथा ग्रेटर और लेसर टुंब द्वीपों को लेकर पुराना क्षेत्रीय विवाद है। कुवैत के ईरान से अपेक्षाकृत संतुलित संबंध रहे हैं, लेकिन उसने भी सावधानीपूर्ण नीति बनाए रखी है।

UAE, बहरीन और कुवैत क्यों नहीं पहुंचे?

विश्लेषकों के अनुसार, इन तीन देशों की अनुपस्थिति केवल प्रोटोकॉल का मामला नहीं बल्कि सुरक्षा और विदेश नीति से जुड़ा संकेत भी मानी जा रही है। हालिया क्षेत्रीय संघर्ष के दौरान ईरान और अमेरिका-समर्थित ठिकानों को लेकर तनाव बढ़ा था, जिससे खाड़ी देशों की सुरक्षा चिंताएं और गहरी हुईं। ऐसे में तेहरान में उच्च-स्तरीय प्रतिनिधित्व भेजना उनके लिए संवेदनशील राजनीतिक संदेश माना जा सकता था।

ईरानी मीडिया ने दावा किया कि कुछ देशों की अनुपस्थिति के पीछे अमेरिकी दबाव था, हालांकि संबंधित देशों ने इस पर सार्वजनिक प्रतिक्रिया नहीं दी।

सऊदी अरब, कतर और ओमान का अलग रुख

सऊदी अरब, कतर और ओमान ने आधिकारिक प्रतिनिधिमंडल भेजकर अलग संदेश दिया। इसे क्षेत्रीय तनाव कम करने और संवाद बनाए रखने की कोशिश के रूप में देखा जा रहा है। कतर लंबे समय से ईरान के साथ व्यावहारिक संबंध रखता है, जबकि ओमान पारंपरिक रूप से मध्यस्थ की भूमिका निभाता रहा है।

विशेषज्ञों का मानना है कि यह पूरा घटनाक्रम दिखाता है कि खाड़ी देशों की विदेश नीति अब केवल धार्मिक पहचान से नहीं, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा, रणनीतिक हितों और क्षेत्रीय शक्ति संतुलन से भी तय हो रही है। GCC के भीतर भी अलग-अलग देशों की प्राथमिकताएं और कूटनीतिक रणनीतियां अब पहले से अधिक स्पष्ट दिखाई दे रही हैं।

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Tanisha Verma

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