तीसरी बार बने राज्यसभा के उपसभापति
Rajya Sabha Deputy Chairma: राज्यसभा की राजनीति में एक बार फिर हलचल तेज हो गई है। उपसभापति पद को लेकर जहां विपक्ष ने नाराजगी जताते हुए चुनाव प्रक्रिया से दूरी बना ली है, वहीं एक नाम लगातार चर्चा में है हरिवंश नारायण सिंह। खास बात यह है कि बदलते राजनीतिक समीकरणों और गठबंधनों के बावजूद उनकी स्थिति इस अहम संवैधानिक पद पर मजबूत बनी रही है।
ताजा घटनाक्रम में, उन्हें एक बार फिर राज्यसभा के उपसभापति के रूप में चुने जाने की तैयारी है। यदि ऐसा होता है, तो वे इस पद पर लगातार तीसरी बार काबिज होने वाले और मनोनीत सांसद के तौर पर यह जिम्मेदारी संभालने वाले पहले व्यक्ति बन जाएंगे।
इस पूरे मुद्दे पर विपक्ष ने तीखी प्रतिक्रिया दी है। कांग्रेस समेत कई दलों का आरोप है कि उपसभापति के चयन को लेकर उनसे कोई सार्थक चर्चा नहीं की गई। साथ ही यह भी सवाल उठाया जा रहा है कि जब लोकसभा में वर्षों से डिप्टी स्पीकर का पद खाली है, तो राज्यसभा में इस प्रक्रिया को इतनी तेजी से क्यों आगे बढ़ाया जा रहा है। इसी असहमति के चलते विपक्ष ने उपसभापति चुनाव का बहिष्कार करने का फैसला लिया है।
हरिवंश नारायण सिंह का जीवन सफर बेहद साधारण पृष्ठभूमि से शुरू होकर राष्ट्रीय राजनीति के शीर्ष तक पहुंचने की कहानी है। 30 जून 1956 को उत्तर प्रदेश के बलिया में जन्मे हरिवंश का नाता बिहार के सारण जिले के सिताब दियारा गांव से भी रहा है, जो समाजवादी विचारक जयप्रकाश नारायण की जन्मभूमि के रूप में जाना जाता है। उन्होंने बनारस हिंदू विश्वविद्यालय से अर्थशास्त्र में स्नातकोत्तर और पत्रकारिता में डिप्लोमा किया। छात्र जीवन में ही वे सामाजिक आंदोलनों से प्रभावित हुए और 1974 के जेपी आंदोलन में सक्रिय भागीदारी निभाई।
हरिवंश का करियर पत्रकारिता से शुरू हुआ। बेहद मामूली वेतन पर उन्होंने अपनी पहली नौकरी की और धीरे-धीरे मीडिया जगत में पहचान बनाई। उन्होंने लंबे समय तक संपादक के रूप में काम किया और करीब ढाई दशक तक एक प्रमुख अखबार का नेतृत्व किया। इसी दौरान वे पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर के मीडिया सलाहकार भी रहे, जिससे उनकी राजनीतिक समझ और संपर्क मजबूत हुए।
उनका राजनीतिक सफर अचानक शुरू हुआ। 2014 में बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने उन्हें राज्यसभा भेजने का फैसला लिया। खुद हरिवंश ने एक बार बताया था कि उन्हें इस फैसले की जानकारी भी आखिरी वक्त में फोन कॉल के जरिए मिली।
2018 में वे पहली बार एनडीए के उम्मीदवार के तौर पर राज्यसभा के उपसभापति चुने गए। इसके बाद 2020 में उन्होंने दोबारा यह पद हासिल किया। अपने कार्यकाल के दौरान उन्होंने कई अहम विधेयकों पर सदन की कार्यवाही का संचालन किया, जिनमें विवादित कृषि कानून भी शामिल रहे।
हरिवंश के राजनीतिक करियर का सबसे दिलचस्प पहलू यह रहा कि जिनकी पार्टी ने उन्हें राज्यसभा भेजा, वही पार्टी बाद में एनडीए से अलग हो गई। 2022 में जदयू के महागठबंधन में शामिल होने के बावजूद हरिवंश उपसभापति पद पर बने रहे। उन्होंने कई मौकों पर पार्टी लाइन से अलग जाकर अपने संवैधानिक दायित्वों को प्राथमिकता दी, जिससे उनकी एक स्वतंत्र और संतुलित छवि बनी।
अप्रैल 2026 में उनका कार्यकाल खत्म होने के तुरंत बाद उन्हें फिर से राज्यसभा के लिए मनोनीत कर दिया गया। उनका नया कार्यकाल 2032 तक रहेगा। अब वे लगातार तीसरी बार उपसभापति बनने की दहलीज पर हैं। अगर यह होता है, तो यह न केवल व्यक्तिगत उपलब्धि होगी, बल्कि संसदीय इतिहास में एक नया अध्याय भी जोड़ेगी।
हरिवंश नारायण सिंह की कहानी सिर्फ एक नेता की नहीं, बल्कि उस व्यक्ति की है जिसने बदलते राजनीतिक हालात में भी अपने पद और भूमिका को स्थिर बनाए रखा। जहां एक ओर सियासी खींचतान जारी है, वहीं दूसरी ओर उनका यह सफर दिखाता है कि कभी-कभी राजनीति में व्यक्तित्व और संतुलन भी बड़ी भूमिका निभाते हैं।
ये भी पढ़ें: नारी शक्ति ही मजबूत भारत की पहचान’ 2023 का महिला आरक्षण कानून लागू, अधिसूचना के बाद बोले PM मोदी
IIT Bombay Student Death: IIT बॉम्बे के 20 वर्षीय BTech छात्र के माता-पिता ने मुंबई…
Rahul Gandhi Vote Chori Allegation: लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने गुरुवार को मुख्य…
AI E-Waste: दुनिया में AI का इस्तेमाल बढ़ने के साथ डेटा सेंटर और कंप्यूटिंग मशीनों…
Meerut: मेरठ के शास्त्रीनगर स्थित सेंट्रल मार्केट के ध्वस्तीकरण से प्रभावित करीब 650 व्यापारियों को…
ECINet Voter Deletion Rollback: चुनाव आयोग ने India Today को बताया कि ECINet सिस्टम में…
CJP Gyanesh Kumar Resignation Demand: नई दिल्ली में प्रेस कॉन्फ्रेंस कर Cockroach Janta Party (CJP)…