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अरावली पर आए फैसले से देश भर में बवाल, क्यों खतरे में है भारत की हरित ढाल? जाने कहां से शुरू हुई लड़ाई

Aravalli Controversy: अरावली पर्वतमाला, उत्तर और पश्चिम भारत की सबसे प्राचीन हिमनदी के रूप में जाना जाता है, आज सबसे बड़े पर्यावरणीय और राजनीतिक विवाद का केंद्र बन चुकी है। हाल ही में सुप्रीम कोर्ट द्वारा अरावली की नई परिभाषा स्वीकार किए जाने के बाद से विवाद में तेजी आ गई है।

सुप्रीम कोर्ट ने क्या फैसला दिया?

सुप्रीम कोर्ट ने 20 नवंबर 2025 को अरावली पहाड़ियों के बारे में एक नई कानूनी परिभाषा तय की, जिसके तहत अब केवल वह भू‑आकृतियाँ ‘अरावली’ मानी जाएँगी जिनकी स्थानीय धरातल से ऊँचाई कम‑से‑कम 100 मीटर हो और दो या अधिक ऐसी पहाड़ियाँ 500 मीटर के भीतर हों। इस निर्णय के बाद से यह बताया जा रहा है कि 100 मीटर से कम ऊँचाई वाली ढलानें अब कानूनी तौर पर “अरावली” नहीं मानी जाएँगी जिससे बाद विवाद और बढ़ गया।

किस वजह से बढ़ा विवाद ?

नई परिभाषा के अनुसार 100 मीटर से नीचे की कई ढलान और पहाड़ियाँ अब ‘अरावली’ श्रेणी से बाहर आ सकती हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि यह बदलाव पारिस्थितिक रूप से महत्वपूर्ण इलाक़ों को संरक्षण से दूर कर सकता है, जिससे-

• धरती की हरित सुरक्षा ढाल कमजोर होगी
• धूल, रेगिस्तान का फैलाव बढ़ सकता है
• जलस्तर गिर सकता है
• दिल्ली‑NCR में प्रदूषण और मौसम स्थितियों पर गंभीर प्रभाव पड़ेगा

पर्यावरण विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि यह कदम अरावली के पारिस्थितिकी, जलवायु संतुलन और जैव विविधता के लिये लगातार नुकसानदेह हो सकता है।

सरकार की सफाई और स्टैंड

केंद्रीय पर्यावरण मंत्री भूपेंद्र यादव ने विवाद पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा है कि 90% से अधिक अरावली क्षेत्र संरक्षित जोन में ही रहेगा, और नई परिभाषा से खनन में कोई ढील नहीं दी गई है। उन्होंने गलतफहमियों को दूर करते हुए बताया कि-

• नई परिभाषा में सिर्फ ऊँचाई ही नहीं बल्कि ढलान की *पूरी संरचना शामिल है
• केवल लगभग 0.19% क्षेत्र ही खनन के लिये पात्र माना गया है
• दिल्ली‑NCR में खनन पूरी तरह प्रतिबंधित रहेगा

सरकार का कहना है कि विवादित दावे “गलत जानकारी” पर आधारित हैं और अरावली की सुरक्षा में कोई ढील नहीं दी जा रही है।

विरोध और प्रदर्शनों की लहर

देश के कई हिस्सों जैसे हरियाणा, राजस्थान और उत्तर भारत में पर्यावरण कार्यकर्ता, नागरिक समूह, सामाजिक मीडिया एक्टिविस्ट और स्थानीय लोग बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं। प्रत्यक्षदर्शी और समूह यह मांग कर रहे हैं कि अरावली को पूरी तरह से ‘पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील क्षेत्र (Eco‑Critical Area)’ घोषित किया जाए और इसके संरक्षण को कानून के तहत और सख्ती से लागू किया जाए। प्रदर्शनकारियों का कहना है कि यदि यह परिभाषा लागू रहती है, तो अरावली का बड़ा हिस्सा संरक्षण से बाहर जा सकता है, और यह क्षेत्र खनन, निर्माण तथा वाणिज्यिक गतिविधियों के लिये खुल सकता है।

सोशल मीडिया और जनता की प्रतिक्रिया

सोशल मीडिया पर #SaveAravalli, #AravalliControversy जैसी मुहिमें तेजी से वायरल हो रही हैं। लोग कई चिंताएँ और सुझाव साझा कर रहे हैं। कई लोगों ने यह दावा किया कि नई परिभाषा से 90% से अधिक अरावली भाग असुरक्षित हो सकते हैं, जिससे प्राकृतिक संरक्षण पर भारी असर होगा। कुछ उपयोगकर्ताओं ने कहा कि नक्शे में बदलाव और पुराने भू‑भागों को हटाना पारिस्थितिक संकट उत्पन्न कर सकता है। वहीं कुछ लोग सरकार की सफाई को समर्थन भी दे रहे हैं और गलतफहमियों का हवाला दे रहे हैं।

पर्यावरणीय और राजनीतिक विवाद का असर

इस मुद्दे ने सिर्फ पर्यावरणवादियों को नहीं बल्कि राजनीतिक दलों को भी सक्रिय रूप से प्रतिक्रिया देने पर मजबूर किया है। राज्य और केंद्र स्तर पर बयानबाजी और आरोप‑प्रत्यारोप जारी हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि यह मामला केवल कानूनी शब्दों का विवाद नहीं है, बल्कि भारत के पारिस्थितिक संतुलन, भू‑जल, हवा की गुणवत्ता और ग्रामीण अर्थव्यवस्था के लिये भी गंभीर परिणाम ला सकता है।

सरकार ने दिया भरोसा

अरावली विवाद अब सिर्फ एक कानूनी तकनीकी मुद्दा नहीं रह गया है, यह पर्यावरण सुरक्षा, राजनीतिक ध्रुवीकरण, सामाजिक मीडिया आंदोलन और जनता की भावनाओं का संगम बन चुका है। जहाँ सरकार और सुप्रीम कोर्ट का कहना है कि अरावली संरक्षित रहेगी, वहीं पर्यावरण कार्यकर्ता इसका दीर्घकालिक प्रभाव लेकर सतर्क हैं। इस कदम का वास्तविक परिणाम आने वाले महीनों में मतदान, भूमि उपयोग नीति और स्थानीय आर्थिक हितों पर साफ़ दिखेगा।

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Shagun Chaurasia

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