Delhi Housing Dispute: राजधानी दिल्ली के वसंत कुंज के मसूदपुर में महर्षि दयानंद को-ऑपरेटिव ग्रुप हाउसिंग सोसाइटी (MDCGHS) के 181 परिवारों का अपने घर में जाने का सपना चार दशकों से अधर में लटका हुआ है। सदस्य अब तक 218 करोड़ रुपए से अधिक जमा कर चुके हैं। साल 1983 से अबतक 181 फ्लैट का 90 प्रतिशत अधिक काम पूरा होने के बावजूद भी आज तक किसी को पजेशन नहीं मिला। कई बुजुर्ग सदस्य तो आस लगाए ही दुनिया छोड़ गए। पूर्व आईएएस अधिकारी बीएन सिंह ने इस पूरे मामले पर एक विस्तृत केस स्टडी तैयार की है, जिसमें प्रशासनिक मनमानी, कानूनी दांवपेंच और वित्तीय अनियमितताओं का कच्चा चिट्ठा सामने रखा गया है।
फ्रीहोल्ड जमीन और 18 सदस्यों की सदस्यता पर कैंची
दिल्ली की ज्यादातर सोसायटियों को DDA से लीजहोल्ड जमीन मिलती है, लेकिन MDCGHS को सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद 15,000 वर्ग मीटर जमीन फ्रीहोल्ड के रूप में मिली थी। विवाद की जड़ 2010-11 में शेयर ट्रांसफर के जरिए जुड़े 18 सदस्य बने। ये लोग 16 साल से लगातार किश्त भी भर रहे थे और आम बैठकों में वोट भी डाल रहे थे। मगर 9 सितंबर 2026 को रजिस्ट्रार को-ऑपरेटिव सोसाइटीज ने बिना कोई नोटिस दिए या बिना उनका पक्ष सुने, सीधे एक पत्र जारी कर इन 18 लोगों की सदस्यता अमान्य कर दी। इसके पीछे नियम 29(g) का हवाला दिया गया, जो केवल खून के रिश्तों में शेयर ट्रांसफर की बात करता है। वहीं सोसाइटी का तर्क है कि यह नियम लीजहोल्ड संपत्तियों के लिए है, न कि उनके जैसी फ्रीहोल्ड जमीन और रजिस्टर्ड बाय-लॉज वाली सोसायटियों पर।
कोर्ट की निगरानी में चुनाव, फिर प्रशासक की एंट्री
अगस्त 2026 में दिल्ली हाई कोर्ट के आदेश पर रिटायर्ड जिला जज को बतौर ऑब्जर्वर तैनात कर चुनाव कराए गए। 9 अगस्त को हुए मतदान में इन 18 सदस्यों ने भी वोट डाला और बाकायदा नई प्रबंध समिति चुनी गई। ऑब्जर्वर ने भी चुनाव को पूरी तरह निष्पक्ष और शांतिपूर्ण बताया। कानून के मुताबिक चुनाव को चुनौती देने की 30 दिन की मियाद खत्म होते ही, अगले ही दिन रजिस्ट्रार ने सदस्यता वाले पुराने आदेश की आड़ में पूरे चुनाव को 'समीक्षाधीन' बता दिया। इसके बाद 29 सितंबर 2026 को चुनी हुई कमेटी को किनारे कर वहां प्रशासक बिठा दिया गया, जिससे लोकतांत्रिक प्रक्रिया पर सीधे सवाल खड़े हो गए।
नकद लेन-देन के आरोप और सीलिंग की दोहरी मार
पूरे प्रकरण में पैसे के खेल और लापरवाही के गंभीर आरोप भी सामने आए हैं। चुनाव कराने आए रिटर्निंग ऑफिसर का मानदेय सिर्फ 10 हजार रुपए तय था, लेकिन तत्कालीन पदाधिकारियों की लिखित शिकायत के मुताबिक उनसे 1 लाख रुपए नकद लिए गए और कोई रसीद तक नहीं दी गई। बाद में 1.80 लाख रुपए का बिल बनाकर इसे चुनाव खर्च में खपाने की कोशिश हुई, जिसकी शिकायतें केंद्रीय सतर्कता आयोग और विजिलेंस में दर्ज हैं। वहीं, दूसरी तरफ नगर निगम ने स्वीकृत नक्शे से ज्यादा निर्माण का हवाला देकर नवंबर 2023 से पूरी साइट सील कर रखी है। इसके अलावा एक इलेक्ट्रिकल ठेकेदार के 1.46 करोड़ रुपए के बकाये के चलते मई 2026 से सोसाइटी का बैंक खाता भी अटैच पड़ा है। नतीजा यह है कि साइट पर सारा काम बंद है, स्टाफ को महीनों से वेतन नहीं मिला और अपनी जीवनभर की कमाई झोंक चुके लोग आज भी किराए के मकानों में रहने को मजबूर हैं।
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