Doosra Movie Review: क्रिकेट के मैदान पर मिली एक ऐतिहासिक जीत किसी की जिंदगी बदलने की प्रेरणा बन सकती है। निर्देशक अभिनय देव की फिल्म 'दूसरा' इसी विचार को पर्दे पर उतारती है। साल 2002 में नेटवेस्ट ट्रॉफी जीतने के बाद लॉर्ड्स की बालकनी में सौरव गांगुली का टी-शर्ट उतारकर लहराना भारतीय क्रिकेट के यादगार पलों में शामिल है। फिल्म इस घटना को एक लड़की के सपनों, आजादी और सामाजिक बंदिशों से संघर्ष की कहानी से जोड़ती है। प्लाबिता बोरठाकुर के अभिनय के साथ फिल्म का विषय भी दर्शकों का ध्यान खींचता है।
एक क्रिकेट मैच से शुरू होती है बदलाव की कहानी
'दूसरा' की कहानी तारा नाम की लड़की के इर्द-गिर्द बुनी गई है, जो राजस्थान के एक रूढ़िवादी परिवार में रहती है। तारा अपनी जिंदगी के फैसले खुद लेना चाहती है, लेकिन परिवार और समाज की परंपराएं उसे अपनी मर्जी से जीने की आजादी नहीं देतीं। इसी दौरान भारतीय क्रिकेट टीम इंग्लैंड को हराकर नेटवेस्ट ट्रॉफी जीतती है। सौरव गांगुली का लॉर्ड्स की बालकनी में जश्न मनाने का अंदाज तारा को भी अपने लिए खड़े होने की प्रेरणा देता है। क्रिकेट की जीत और तारा के निजी संघर्ष को जोड़कर फिल्म यह बताने की कोशिश करती है कि कभी-कभी कोई ऐतिहासिक पल किसी अनजान इंसान के भीतर भी बदलाव की शुरुआत कर सकता है।
कहानी और निर्देशन में क्या है खास
अभिनय देव ने क्रिकेट की घटना को केवल खेल की कहानी बनाकर पेश नहीं किया है। फिल्म का केंद्र एक लड़की की आजादी और अपनी पहचान बनाने की इच्छा है। वास्तविक क्रिकेट फुटेज और काल्पनिक कहानी का मेल इसे अलग अंदाज देता है। करीब 78 मिनट की यह फिल्म कम समय में अपना संदेश पहुंचाने की कोशिश करती है। हालांकि, तारा के संघर्ष और उसके फैसलों को कुछ और समय दिया जाता तो कहानी का भावनात्मक पक्ष और मजबूत हो सकता था। इसके बावजूद क्रिकेट के ऐतिहासिक पल को सामाजिक बदलाव से जोड़ने का विचार फिल्म को एक अलग पहचान देता है।
प्लाबिता बोरठाकुर ने संभाली कहानी की कमान
तारा की भूमिका में प्लाबिता बोरठाकुर ने अपने अभिनय से किरदार की उलझन और भीतर चल रहे संघर्ष को सामने रखा है। वह एक ऐसी लड़की के रूप में दिखाई देती हैं, जो परिवार से जुड़ी भी रहना चाहती है और अपनी स्वतंत्र पहचान भी बनाना चाहती है। उनके अभिनय में किरदार की बेचैनी और बदलाव की चाह साफ नजर आती है। वहीं, तारा के पिता के रूप में अंकुर विकल ने एक ऐसे व्यक्ति का किरदार निभाया है, जो बेटी से स्नेह तो करता है, लेकिन पुरानी मान्यताओं से बंधा हुआ है। त्विशा जोशी, समीधा गुरु और कृष्णा गोकानी ने भी अपनी-अपनी भूमिकाएं निभाई हैं।
रिलीज से पहले कानूनी विवाद में आई फिल्म
'दूसरा' की चर्चा केवल इसकी कहानी को लेकर नहीं हुई। रिलीज से पहले सौरव गांगुली ने फिल्म के खिलाफ दिल्ली हाई कोर्ट का रुख किया था। गांगुली और उनकी अधिकृत बायोपिक का निर्माण कर रही लव फिल्म्स एलएलपी ने आरोप लगाया कि फिल्म में उनकी पहचान, व्यक्तित्व और 2002 के लॉर्ड्स सेलिब्रेशन का उचित अनुमति के बिना व्यावसायिक इस्तेमाल किया गया है। उन्होंने फिल्म की रिलीज पर रोक लगाने की मांग की थी। दी गई जानकारी के अनुसार, 22 अक्टूबर को दिल्ली हाई कोर्ट ने फिल्म की 23 अक्टूबर को प्रस्तावित रिलीज पर तत्काल रोक लगाने से इनकार कर दिया। अदालत ने मामले की आगे सुनवाई तय की। फिल्म निर्माताओं का कहना था कि 'दूसरा' गांगुली की बायोपिक नहीं है, बल्कि एक ऐसी लड़की की कहानी है, जिसे क्रिकेट की एक ऐतिहासिक घटना से प्रेरणा मिलती है। इस विवाद ने फिल्म को रिलीज से पहले ही सुर्खियों में ला दिया।
संगीत और एडिटिंग का कैसा है असर
राम संपत का संगीत फिल्म के भावनात्मक दृश्यों को सहारा देता है। पुराने क्रिकेट फुटेज और तारा की निजी जिंदगी के बीच तालमेल बनाने में एडिटिंग भी अहम भूमिका निभाती है। क्रिकेट के दृश्य कहानी को वर्ष 2002 के उस यादगार पल से जोड़ते हैं, जिसने भारतीय क्रिकेट प्रेमियों के बीच खास जगह बनाई।
देखनी चाहिए या नहीं
'दूसरा' की सबसे बड़ी खासियत इसका विचार है। फिल्म क्रिकेट के एक चर्चित पल के जरिए आजादी, आत्मसम्मान और सामाजिक बंदिशों से बाहर निकलने की बात करती है। प्लाबिता बोरठाकुर का अभिनय और कहानी का अनूठा आधार इसे देखने की वजह देते हैं। वहीं, कुछ हिस्सों में कहानी को और विस्तार मिल सकता था।
रेटिंग: 3.5/5 स्टार
कुल मिलाकर, 'दूसरा' उन दर्शकों को पसंद आ सकती है, जो क्रिकेट से जुड़ी यादों के साथ सामाजिक मुद्दों पर बनी फिल्में देखना चाहते हैं। इसका संदेश सरल है, दूसरों की हिम्मत कभी-कभी हमें अपनी जिंदगी बदलने का साहस दे सकती है।
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