Kathakali Dance: केरल की हरियाली और शांत वातावरण से जन्मी कथकली केवल एक नृत्य नहीं, बल्कि विश्व की प्राचीन और भव्य रंगमंच परंपराओं में गिनी जाने वाली कला है। इसमें कलाकार बिना बोले ही अपने चेहरे के हाव-भाव, रंगों और आंखों की अभिव्यक्ति से पूरी कथा दर्शकों तक पहुंचाते हैं।
कथकली शब्द ‘कथा’ और ‘कली’ से मिलकर बना है, जिसका अर्थ है कहानी को खेल या नाटक के रूप में प्रस्तुत करना। यह नृत्य शैली मूल रूप से इसी उद्देश्य के साथ विकसित हुई थी। आइए जानते हैं इसके इतिहास और विशेषताओं के बारे में।
कथकली की उत्पत्ति 17वीं शताब्दी के आसपास मानी जाती है। इसके पीछे एक रोचक कथा प्रचलित है। कहा जाता है कि कालीकट के जमोरिन राजा ने ‘कृष्णट्टम’ नामक नृत्य-नाटक की रचना की थी। जब कोट्टारक्करा के राजा ने इसे अपने दरबार में प्रस्तुत करने का अनुरोध किया, तो जमोरिन ने इसे अस्वीकार कर दिया, जिसे अपमान के रूप में देखा गया।
इसके बाद कोट्टारक्करा के राजा ने इस चुनौती को स्वीकार करते हुए ‘रामनाट्टम’ की रचना की, जो आगे चलकर कथकली के रूप में विकसित हुआ। समय के साथ इसमें महाभारत और अन्य पौराणिक कथाओं को भी शामिल किया गया, जिससे इसकी व्यापकता बढ़ी।
कथकली की सबसे खास पहचान इसकी भव्य वेशभूषा और मेकअप है, जिसे ‘कोप्पु’ कहा जाता है। इसमें पात्रों की प्रकृति और स्वभाव को चेहरे के रंगों के माध्यम से दर्शाया जाता है। मुख्य रूप से पांच प्रकार के रूप होते हैं
पचा (हरा): यह रंग भगवान कृष्ण, राम और अर्जुन जैसे वीर और धर्मपरायण पात्रों का प्रतीक है।
कथी (छुरी): हरे रंग के साथ लाल धारियों और विशेष चिन्हों वाला यह रूप रावण जैसे शक्तिशाली लेकिन अहंकारी पात्रों को दर्शाता है।
थाड़ी (दाढ़ी): इसमें लाल (दुष्ट), सफेद (भक्तिपूर्ण, जैसे हनुमान) और काली (जंगली स्वभाव) दाढ़ी वाले रूप शामिल हैं।
करी (काला): यह क्रूर और तामसिक पात्रों के लिए प्रयोग किया जाता है।
मिनुक्कू (चमक): यह साधु-संतों और महिला पात्रों के लिए होता है, जिसमें हल्के रंगों का उपयोग किया जाता है।
एक अनोखी परंपरा के तहत कलाकार अपनी आंखों को लाल दिखाने के लिए प्राकृतिक बीजों का उपयोग करते हैं, जिससे उनकी आंखों की गतिविधियां और भी प्रभावशाली नजर आती हैं।
कथकली की खासियत यह है कि इसमें कलाकार संवाद नहीं बोलते। वे हाथों की मुद्राओं, चेहरे के भाव और आंखों की हरकतों से पूरी कहानी प्रस्तुत करते हैं। इसकी संगीत शैली को ‘सोपानम’ कहा जाता है, जो अभिनय के साथ तालमेल बनाती है। भारी पोशाक और लंबे समय तक चलने वाले प्रदर्शन के कारण इस कला में दक्षता हासिल करने के लिए वर्षों का कठोर अभ्यास और अनुशासन आवश्यक होता है।
शुरुआत में यह कला मंदिरों और शाही दरबारों तक सीमित थी, लेकिन धीरे-धीरे आम लोगों तक पहुंची और विश्व स्तर पर पहचान बनाने लगी। आज कथकली भारतीय सांस्कृतिक धरोहर का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है, जिसे दुनिया भर में सराहा जाता है।
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