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El Niño के बीच कमजोर रहा 2026 का मॉनसून, महाराष्ट्र के मराठवाड़ा में 80% फसलें बर्बाद

India Monsoon 2026: भारत में इस साल मजबूत अल-नीनो के बीच मॉनसून कमजोर रहा। जून से सितंबर के दौरान देश में 759.4 मिलीमीटर बारिश हुई, जबकि सामान्य औसत 868.6 मिलीमीटर है। यानी बारिश सामान्य से 12.6 फीसदी कम रही। 2026 का मॉनसून 2001 के बाद चौथा सबसे कमजोर मॉनसून रहा। कम बारिश का असर खेती और जलस्रोतों पर पड़ा है। महाराष्ट्र के मराठवाड़ा में स्थिति सबसे गंभीर इलाकों में है, जहां करीब 80 फीसदी फसलें खराब होने की बात सामने आई है।

जून में 35% कम बारिश, जुलाई में मिली थोड़ी राहत

मॉनसून की शुरुआत ही कमजोर रही। जून में देश में सामान्य से करीब 35 फीसदी कम बारिश हुई। इस दौरान बंगाल की खाड़ी में कम दबाव वाले मौसम सिस्टम भी कम बने। ये सिस्टम समुद्र से नमी को देश के अंदरूनी हिस्सों तक पहुंचाने में अहम भूमिका निभाते हैं। जुलाई में स्थिति कुछ सुधरी और बारिश सामान्य से करीब 1 फीसदी अधिक रही। इससे शुरुआती कमी कुछ कम हुई, लेकिन अगस्त और सितंबर में फिर बारिश कम रही। चार महीनों में सामान्य से करीब 109 मिलीमीटर कम पानी बरसा।

कम दबाव वाले सिस्टम से कहीं राहत, कहीं रिकॉर्ड बारिश

बंगाल की खाड़ी में बाद में बने कम दबाव वाले सिस्टम ने पूर्वी और मध्य भारत के कुछ हिस्सों में बारिश की कमी कम की। ओडिशा इसका प्रमुख उदाहरण रहा, जहां ऐसे कई सिस्टम बनने से कुछ स्थानों पर रिकॉर्ड बारिश दर्ज की गई। इससे साफ हुआ कि अल-नीनो का प्रभाव पूरे देश में समान नहीं रहा। कुछ क्षेत्रों में बारिश कम रही, जबकि मौसम प्रणालियों की वजह से कुछ राज्यों में सामान्य से अधिक बारिश हुई।

मराठवाड़ा में फसलों पर सबसे ज्यादा असर

कम बारिश और लंबे सूखे का सीधा असर खरीफ की फसलों पर पड़ा। सोयाबीन, कपास, अरहर और अन्य फसलों की बढ़त प्रभावित हुई। मराठवाड़ा के लातूर, बीड, परभणी और धाराशिव में जून-सितंबर के दौरान सामान्य 679.5 मिलीमीटर के मुकाबले सिर्फ 424.5 मिलीमीटर बारिश हुई। कई जगह सोयाबीन पीली पड़ गई, कपास की बढ़त रुक गई और अरहर सूखने लगी। गन्ने को भी नुकसान हुआ। इन इलाकों में करीब 80 फीसदी फसलें खराब होने की बात सामने आई है।

लातूर के सावरगांव रोकड़े के किसान राम बेल्लाडे ने आठ एकड़ में सोयाबीन, अरहर और ज्वार बोई थी, जिस पर करीब 1.5 लाख रुपये खर्च हुए। फसल खराब होने के बाद खेत साफ करने के लिए करीब 5 हजार रुपये प्रति एकड़ तक अतिरिक्त खर्च आने की बात सामने आई है। गन्ना, जो सामान्यतः 20-25 फुट तक बढ़ता है, कई खेतों में केवल 10-12 फुट तक पहुंचकर सूखने लगा।

जलाशयों में भी सिर्फ 12.5% पानी

लातूर के 158 जलाशयों में औसतन करीब 12.5 फीसदी पानी बचा है। इससे सिंचाई के साथ पीने और पशुओं के लिए पानी की चिंता भी बढ़ गई है। आगे पर्याप्त बारिश नहीं हुई तो अगली फसल के लिए पानी, बीज, खाद और सिंचाई का खर्च किसानों के लिए बड़ी चुनौती बन सकता है।

महाराष्ट्र के 265 तालुकों में सूखा घोषित

स्थिति को देखते हुए महाराष्ट्र सरकार ने 26 सितंबर को 358 में से 265 तालुकों में सूखा घोषित किया। यानी करीब 74 फीसदी तालुक सूखे की स्थिति में हैं। इन क्षेत्रों में फसल नुकसान का आकलन और पानी-चारे की जरूरत पूरी करने के लिए राहत उपाय किए जा रहे हैं।

किसानों और स्थानीय लोगों ने मौजूदा स्थिति की तुलना 1972 के बड़े सूखे से की है। खराब खरीफ फसल के बाद अब किसानों के सामने अगली खेती के लिए दोबारा बीज, खाद, मजदूरी और सिंचाई का खर्च जुटाने की चुनौती है। इस मॉनसून में अल-नीनो, जून की कम बारिश, कम दबाव वाले सिस्टम की कमी और बारिश के असमान वितरण ने स्थिति को प्रभावित किया।

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