Astra Missile: भारत की स्वदेशी रक्षा तकनीक में इंडोनेशिया की दिलचस्पी बढ़ रही है। ब्रह्मोस मिसाइल के बाद अब इंडोनेशिया भारतीय अस्त्र Mk1 हवा से हवा में मार करने वाली मिसाइल को अपने लड़ाकू विमानों में शामिल करने की संभावनाएं तलाश रहा है। इसके लिए इंडोनेशियाई इंजीनियर Su-30MK2 और Su-27SKM विमानों के साथ मिसाइल की अनुकूलता की जांच कर रहे हैं। इस संभावित सौदे से दोनों देशों के रक्षा संबंधों को मजबूती मिल सकती है।
अस्त्र मिसाइल क्यों खरीदना चाहता है इंडोनेशिया
अस्त्र Mk1 को रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (DRDO) ने विकसित किया है, जबकि इसका निर्माण भारत डायनामिक्स लिमिटेड करता है। यह बियॉन्ड विजुअल रेंज यानी दृश्य सीमा से आगे मौजूद हवाई लक्ष्यों को निशाना बनाने वाली मिसाइल है। इसके निर्यात संस्करण की मारक क्षमता करीब 110 किलोमीटर बताई जाती है। इंडोनेशिया फिलहाल रूसी R-77 मिसाइलों का इस्तेमाल करता है, जिनकी बताई गई मारक क्षमता लगभग 70 से 80 किलोमीटर है। ऐसे में अस्त्र को शामिल करने से उसकी वायुसेना को अधिक दूरी पर हवाई लक्ष्यों को निशाना बनाने का विकल्प मिल सकता है। हालांकि, मिसाइल की वास्तविक क्षमता विमान के रडार और अन्य प्रणालियों के साथ उसके सफल एकीकरण पर भी निर्भर करेगी।
रडार सिस्टम बनेगा सबसे बड़ी चुनौती
इंडोनेशिया के लिए अस्त्र मिसाइल को अपने Su-30 विमानों में शामिल करना आसान नहीं होगा। इसकी प्रमुख वजह दोनों देशों के लड़ाकू विमानों में इस्तेमाल होने वाले रडार सिस्टम का अंतर है। भारतीय Su-30MKI में एन011एम बार्स रडार लगा है, जबकि इंडोनेशिया के Su-30MK2 में एन001वीईपी पल्स-डॉपलर रडार का इस्तेमाल होता है। दोनों प्रणालियों की क्षमताओं में अंतर होने के कारण अस्त्र मिसाइल को इंडोनेशियाई विमानों के साथ जोड़ने के लिए तकनीकी बदलाव करने पड़ सकते हैं। इसके लिए सॉफ्टवेयर और हार्डवेयर में संशोधन के साथ मिसाइल तथा विमान के बीच संचार और लक्ष्य संबंधी आंकड़ों के आदान-प्रदान की व्यवस्था को अनुकूल बनाना होगा। इस प्रक्रिया में भारत डायनामिक्स लिमिटेड और संबंधित भारतीय रक्षा संस्थानों की तकनीकी सहायता उपयोगी हो सकती है।
चीन समेत क्षेत्रीय सुरक्षा पर क्यों है नजर
इंडोनेशिया दक्षिण-पूर्व एशिया में स्थित एक महत्वपूर्ण देश है। दक्षिण चीन सागर के आसपास क्षेत्रीय समुद्री विवादों और चीन की बढ़ती सैन्य गतिविधियों के कारण इस क्षेत्र की सुरक्षा पर लगातार ध्यान दिया जाता है। हालांकि, उपलब्ध जानकारी के आधार पर यह कहना सही नहीं होगा कि अस्त्र मिसाइल खरीदने की संभावित योजना केवल चीन के खतरे को ध्यान में रखकर बनाई गई है। इंडोनेशिया के लिए आधुनिक हवाई हथियार हासिल करना अपनी वायुसेना की क्षमताओं को बढ़ाने और रूसी हथियारों पर निर्भरता कम करने की व्यापक कोशिश का हिस्सा हो सकता है। लेकिन इस संभावित खरीद के पीछे उसकी आधिकारिक रणनीतिक प्राथमिकताओं की पुष्टि अंतिम समझौते और सरकारी बयानों से ही हो सकेगी।
भारत के रक्षा निर्यात के लिए क्यों अहम है यह संभावित सौदा?
भारत और इंडोनेशिया के बीच रक्षा सहयोग बढ़ने से भारतीय स्वदेशी हथियार प्रणालियों के लिए अंतरराष्ट्रीय बाजार में नए अवसर खुल सकते हैं। यदि अस्त्र मिसाइल का इंडोनेशियाई विमानों के साथ एकीकरण सफल रहता है, तो भविष्य में रूसी मूल के लड़ाकू विमान इस्तेमाल करने वाले दूसरे देशों के लिए भी ऐसी संभावना पर विचार किया जा सकता है। फिलहाल मिसाइल की खरीद, उसकी संख्या, कीमत और अंतिम तकनीकी शर्तों को लेकर किसी अंतिम समझौते की पुष्टि जरूरी है। इसलिए इस संभावित सौदे को भारत-इंडोनेशिया रक्षा सहयोग की दिशा में एक अवसर के रूप में देखा जा सकता है, लेकिन इसके वास्तविक परिणाम तकनीकी परीक्षणों और आगे होने वाली बातचीत पर निर्भर करेंगे।
ये भी पढ़ें: बंगाल चुनाव का जिक्र कर नसीरुद्दीन शाह ने बीजेपी को घेरा, छात्रों के समर्थन में उठाई आवाज

