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आंध्र प्रदेश और कर्नाटक में सूखे का संकट, जानें कैसे मानसून में 30% कम बारिश बनी इसकी वजह

Karnataka Andhra Pradesh Drought 2026: कमजोर मानसून के कारण कर्नाटक और आंध्र प्रदेश में जल संकट गहराने लगा है। बारिश की कमी से दोनों राज्यों के कई इलाके सूखे की चपेट में हैं। इससे किसानों की फसलें प्रभावित हुई हैं और लोगों के सामने पेयजल की समस्या बढ़ने की आशंका है। जलाशयों और भूजल के घटते स्तर ने आने वाले महीनों में पानी की उपलब्धता को लेकर चिंता बढ़ा दी है।

मानसून में कितनी कम हुई बारिश?

भारतीय मौसम विज्ञान विभाग (IMD) के हाइड्रोमेट डिवीजन के अनुसार, 1 जून से 30 सितंबर 2026 के बीच कर्नाटक में सामान्य से 30 प्रतिशत और आंध्र प्रदेश में 25 प्रतिशत कम बारिश दर्ज की गई। इसका सबसे अधिक असर कर्नाटक के अंदरूनी सूखाग्रस्त क्षेत्रों और आंध्र प्रदेश के रायलसीमा इलाके में पड़ा है, जहां खेती और घरेलू जल आपूर्ति मुख्य रूप से मौसमी बारिश पर निर्भर है।

सैकड़ों इलाके सूखाग्रस्त घोषित

कर्नाटक सरकार ने राज्य के 240 उप-जिलों में से 217 को सूखाग्रस्त घोषित किया है। वहीं, आंध्र प्रदेश में खरीफ सीजन 2026 के लिए 21 जिलों के 688 उप-जिलों में से 388 को सूखा प्रभावित घोषित किया गया है। इनमें 283 गंभीर और 105 मध्यम श्रेणी में शामिल हैं। दोनों राज्य नुकसान से निपटने के लिए सहायता मांग रहे हैं।

जलाशयों और भूजल पर बढ़ा दबाव

कम बारिश के कारण बांधों और गांवों के तालाबों में पर्याप्त पानी जमा नहीं हो पाया। साथ ही जमीन के भीतर पानी का रिसाव घटने से भूजल भंडार का पुनर्भरण प्रभावित हुआ है।

बारिश नहीं होने पर किसान भूजल पर अधिक निर्भर होते हैं, जिससे बोरवेल सूखने का खतरा बढ़ता है। ऐसे में परिवारों को पानी के टैंकरों या सीमित सरकारी आपूर्ति पर निर्भर रहना पड़ सकता है। हालांकि, हर क्षेत्र में संकट की गंभीरता अलग है। यह जलाशयों के भंडारण, स्थानीय भूजल स्तर, मांग और जल प्रबंधन पर निर्भर करती है।

सूखे से निपटने के लिए क्या कदम जरूरी?

फिलहाल सरकारों के सामने पेयजल आपूर्ति सुनिश्चित करना और फसल नुकसान झेल रहे किसानों को राहत देना बड़ी चुनौती है। सूखा राहत के लिए कृषि नुकसान और पानी की उपलब्धता समेत कई मानकों का आकलन किया जाता है। अंतर-मंत्रालयी केंद्रीय टीम की जांच के बाद राष्ट्रीय आपदा प्रतिक्रिया कोष (NDRF) से पात्र सहायता पर विचार किया जाता है। विशेषज्ञों के अनुसार, भविष्य में ऐसे संकट से बचने के लिए वर्षा जल संचयन, बेहतर भूजल प्रबंधन, कुशल सिंचाई और स्थानीय परिस्थितियों के अनुकूल फसलों का चयन जरूरी है।

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Tanisha Verma

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