Kashmiri Pandit employees terror threat: जम्मू-कश्मीर में कश्मीरी पंडित PM पैकेज के तहत काम कर रहे कर्मचारियों पर एक बार फिर आतंकी खतरा मंडरा रहा है। लश्कर-ए-तैयबा से जुड़े यूनाइटेड लिबरेशन काउंसिल (ULC/ULF) की ओर से जारी ताजा धमकी पत्रों में करीब 7,000 कश्मीरी पंडित कर्मचारियों को नौकरी छोड़ने की चेतावनी दी गई है। दावा है कि कर्मचारियों के निजी फोन नंबर, घर के पते और वाहन रजिस्ट्रेशन की जानकारी ऑनलाइन लीक की गई है।
मुंबई में रहने वाले एक कश्मीरी पंडित, जिनका परिवार श्रीनगर में है, ने कहा कि 1990 के दशक में भी इसी तरह की रणनीति अपनाई जाती थी, फर्क सिर्फ इतना था कि तब इंटरनेट नहीं था और नामों की सूचियां टाइप कर दीवारों पर चिपकाई जाती थीं। दिल्ली में रहने वाले एक कश्मीरी पंडित वकील ने बताया कि उनका परिवार सरकारी कर्मचारी नहीं है, लेकिन घाटी में पंडितों की सुरक्षा को लेकर चिंता बनी हुई है। उनके मुताबिक, इस तरह की धमकियां घाटी में अब आम होती जा रही हैं।
7 सितंबर को समुदाय की आवाज उठाने वाली सबा कौल ने X पर इसे गंभीर सुरक्षा संकट बताया। उन्होंने दावा किया कि ULC ने PM पैकेज कर्मचारियों को सीधे धमकी दी और उनके फोन नंबर, पते व वाहन संबंधी जानकारी सार्वजनिक कर दी। उन्होंने केंद्रीय गृह मंत्रालय और जम्मू-कश्मीर के उपराज्यपाल कार्यालय से मामले की जांच तथा कर्मचारियों की सुरक्षा सुनिश्चित करने की मांग की।
PM पैकेज कर्मचारी और ऑल PM पैकेज एम्प्लॉइज एसोसिएशन से जुड़े राकेश हांडू ने 6 सितंबर को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, उपराज्यपाल मनोज सिन्हा और J&K पुलिस की साइबर क्राइम विंग को शिकायत भेजी। उन्होंने 5 सितंबर के कथित ULC पत्र के आधार पर FIR दर्ज करने की मांग की। पत्र में गैर-स्थानीय कर्मचारियों को लिंग या पद की परवाह किए बिना निशाना बनाने की धमकी दी गई और कहा गया कि उनके शव उनके घर भेजे जाएंगे।
कश्मीरी प्रवासियों के लिए PM पैकेज रोजगार योजना 2008 में शुरू हुई थी। तब 3,000 सरकारी नौकरियों का प्रावधान किया गया था। नवंबर 2015 में 3,000 और पद मंजूर हुए, जिससे केंद्र प्रायोजित पदों की संख्या 6,000 हो गई। हालांकि, मौजूदा धमकियों में करीब 7,000 कश्मीरी पंडितों को निशाना बनाने का दावा किया गया है।
हांडू के अनुसार करीब 6,000 कर्मचारी 15 वर्षों से घाटी में काम कर रहे हैं और कई किराये के मकानों में रहते हैं। ज्यूवान, मट्टन और वीरिनाग में 6,042 क्वार्टर बनाए गए, लेकिन तीन वर्षों में केवल करीब 800 आवंटित किए गए। उन्होंने ट्रांजिट कॉलोनियों और किराये के आवासों का सुरक्षा ऑडिट, धमकी के स्रोत की जांच और सुरक्षित वापसी, नौकरी व भूमि अधिकारों की गारंटी वाली नीति की मांग की।
श्रीनगर के एक वरिष्ठ पत्रकार के मुताबिक धमकी पत्र पहले डार्क वेब पर जारी हुए और बाद में WhatsApp व Telegram पर प्रसारित किए गए। 1 सितंबर को ULC ने एक महीने में पांचवीं धमकी जारी की थी। इसमें दावा किया गया था कि प्रशासन पंडित कर्मचारियों को हल्के हथियार देने पर विचार कर रहा है। हांडू ने कुलगाम के नोआ इलाके में PM पैकेज कर्मचारियों के आवास की तस्वीरें साझा कर आरोप लगाया कि कुछ कॉलोनियां सुनसान और असुरक्षित जगहों पर हैं, जहां सड़क, ड्रेनेज, निर्माण और सुरक्षा व्यवस्था पर्याप्त नहीं है। उन्होंने सवाल उठाया कि ऐसी स्थिति में सरकारी ‘सामान्य स्थिति’ का दावा किसके लिए है।
7 अगस्त के एक अन्य पत्र में ULC ने पंडित अधिकारियों, उनके परिवारों, कार्यस्थलों और ठिकानों की जानकारी होने का दावा किया था और जम्मू जाने पर भी निशाना बनाए जाने की धमकी दी थी। पत्र में छह सरकारी कर्मचारियों के नाम थे, लेकिन उनकी निजी जानकारी प्रकाशित नहीं की गई। पनुन कश्मीर ने नामित कर्मचारियों और उनके परिवारों के तत्काल खतरे का आकलन करने की मांग की।
नेशनल कॉन्फ्रेंस प्रमुख फारूक अब्दुल्ला ने सवाल उठाया कि पंडित कर्मचारियों को ही धमकियां क्यों मिल रही हैं और इसे राज्य का दर्जा बहाल करने में देरी से जोड़ते हुए प्रशासन पर साजिश का आरोप लगाया। BJP ने इसे आतंकवादियों के प्रति ‘सॉफ्ट सपोर्ट’ बताते हुए खारिज किया। मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने हालांकि धमकियों को गंभीरता से लेने और कर्मचारियों की सुरक्षा सुनिश्चित करने की बात कही।
1980 के दशक के अंत और 1990 के दशक की शुरुआत में आतंकवाद के बढ़ने के दौरान लक्षित हत्याओं, धमकियों और मस्जिदों से दी गई चेतावनियों के बीच बड़ी संख्या में कश्मीरी पंडित घाटी छोड़कर जम्मू और देश के अन्य हिस्सों में चले गए थे। उनके पुनर्वास के प्रयासों में PM पैकेज अहम रहा है। 2022 में चडूरा तहसील कार्यालय के भीतर कश्मीरी पंडित कर्मचारी राहुल भट की हत्या ने घाटी में लौटकर काम कर रहे समुदाय की सुरक्षा पर गंभीर सवाल खड़े किए थे। मौजूदा धमकियां प्रशासन के सामने यही चुनौती दोबारा रखती हैं कि पुनर्वास को सिर्फ नौकरियों और मकानों की संख्या से नहीं, बल्कि कर्मचारियों के सुरक्षित जीवन और काम करने के भरोसे से भी मापा जाए।
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