Maharashtra: महाराष्ट्र में गहराते सूखे के बीच नांदेड़ में हाल ही में मंत्री, सांसद और विधायकों की बैठक हुई। बाहर किसान सूखती फसलों, खाली कुओं और मवेशियों के लिए पानी-चारे की चिंता कर रहे थे, जबकि बैठक की मेज पर काजू-बादाम परोसे जाने का वीडियो वायरल हो गया। इसे लेकर राजनीतिक विवाद खड़ा हो गया।
किसानों का कहना है कि मौजूदा संकट 1972 के भीषण सूखे से भी गंभीर है, जब लगातार तीन कमजोर मानसून ने महाराष्ट्र को प्रभावित किया था। अल नीनो के बीच कम और अनियमित बारिश से इस बार फसलें पहले ही खराब हो चुकी हैं। अब सबसे बड़ी चुनौती वर्षों में तैयार हुए फलों के पेड़ों और बेलों को जीवित रखने की है।
265 तालुका सूखाग्रस्त, बारिश में 18.8% की कमी
महाराष्ट्र सरकार ने 358 में से 265 तालुका यानी राज्य के करीब तीन-चौथाई हिस्से को सूखाग्रस्त घोषित किया है। बारिश में 18.8% की कमी और लंबे ड्राई स्पेल के कारण मराठवाड़ा और विदर्भ सबसे ज्यादा प्रभावित क्षेत्रों में हैं। सितंबर मध्य तक करीब 84% महाराष्ट्र असामान्य रूप से शुष्क या सूखे की चपेट में था, जबकि 56.5% हिस्सा गंभीर सूखे या उससे बदतर स्थिति में था। अगस्त में यह आंकड़ा करीब 14% था। मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस भी चेतावनी दे चुके हैं कि इस साल का सूखा 1972 से भी खराब हो सकता है।
अंगूर की फसल गई तो एक साल, बेल गई तो चार साल का नुकसान
नासिक, सांगली, सोलापुर और पुणे महाराष्ट्र के प्रमुख अंगूर उत्पादक क्षेत्र हैं। अक्टूबर में अंगूर की बेलों की फ्रूट प्रूनिंग होती है, जिसके बाद मार्च-अप्रैल तक कटाई का चक्र चलता है। पानी की कमी से अब बेलें सूखने लगी हैं। महाराष्ट्र ग्रेप ग्रोअर्स एसोसिएशन के अध्यक्ष कैलास भोसले के मुताबिक, दो महीने से बारिश नहीं हुई है और जलाशयों का पानी भी कृषि-बागवानी के लिए सीमित है। उन्होंने बेलों को बचाने के लिए ट्रेन से पानी पहुंचाने की मांग की है। बेलें सूखने पर दोबारा पौधे लगाने के बाद व्यावसायिक उत्पादन शुरू होने में कम से कम चार साल लग सकते हैं।
किसान तक के विशेष संवाददाता नासिर हुसैन के अनुसार, अंगूर उत्पादक केवल इनपुट पर प्रति सीजन प्रति एकड़ करीब 50,000 से 60,000 रुपये खर्च करते हैं।
भारत के अंगूर उत्पादन में महाराष्ट्र की 69% से ज्यादा हिस्सेदारी
केंद्रीय कृषि मंत्रालय के अनुसार, 2024-25 में भारत के अंगूर उत्पादन में महाराष्ट्र की हिस्सेदारी 69% से अधिक थी। भारत ने 2025-26 में करीब 2.24 लाख टन अंगूर का निर्यात किया, जिसकी कीमत लगभग 368 मिलियन डॉलर थी। नीदरलैंड, रूस, ब्रिटेन, UAE और बांग्लादेश प्रमुख बाजार रहे। मौजूदा संकट से पहले भी उद्योग दबाव में था। 2025-26 में नासिक से अंगूर निर्यात लंबे समय तक बारिश और ओलावृष्टि के कारण 9.6% घटकर करीब 1.6 लाख टन से 1.4 लाख टन रह गया था।
आम, अनार, केला और संतरे के बाग भी संकट में
महाराष्ट्र में 2024-25 में करीब 1.67 लाख हेक्टेयर में आम, 1.41 लाख हेक्टेयर में केला, 1.19 लाख हेक्टेयर में अंगूर और 1.07 लाख हेक्टेयर में अनार की खेती थी। ये फल भारत के निर्यात में भी महत्वपूर्ण हैं। अमरावती के संतरा बागों को भी भारी नुकसान हुआ है। रिपोर्ट के मुताबिक, करीब 5,000 हेक्टेयर क्षेत्र में पेड़ काटे जा चुके हैं, जबकि बचे पेड़ों में फूल, फल बनने और उनके आकार पर असर पड़ा है।
KVK नारायणगांव के अध्यक्ष अनिल मेहर के अनुसार, मौजूदा परिस्थितियों में करीब 30% फल उत्पादन ही बचाया जा सकता है। इसके लिए शेड नेट और सरकारी सब्सिडी की जरूरत होगी। 50% शेड नेट की कीमत करीब 17 रुपये प्रति वर्ग मीटर है। एक एकड़ के लिए केवल नेट पर करीब 69,000 रुपये और एक-दो एकड़ पर 69,000 से 1.38 लाख रुपये खर्च हो सकते हैं। खंभे, तार और इंस्टॉलेशन का खर्च अलग होगा।
अल्फांसो को 85-90% नुकसान, केले के दाम भी गिरे
2026 में चरम मौसम के कारण देवगढ़ के अल्फांसो आम को पहले ही 85-90% तक नुकसान होने की बात सरकारी सर्वे में सामने आई थी। सोलापुर, अहिल्यानगर, पुणे और आसपास के इलाकों में अनार के उत्पादन पर भी खतरा है। जलगांव में कम सितंबर बारिश ने केले की गुणवत्ता प्रभावित की है और थोक कीमतें गिर गई हैं। एक किसान ने व्यापारियों से महज 3 रुपये प्रति किलो का भाव मिलने के बाद चार एकड़ की केले की फसल नष्ट कर दी।
रोज पानी पर 3,000 रुपये खर्च कर रहे किसान
छत्रपति संभाजीनगर के शाहपुर में किसान बद्रीनाथ भारत का कुआं सूखने के बाद उन्हें दो टैंकरों पर रोज 3,000 रुपये खर्च करने पड़ रहे हैं। कपास और मक्का पहले ही बर्बाद हो चुके हैं। खरीदा गया पानी अदरक की फसल, परिवार और 10 मवेशियों के लिए इस्तेमाल हो रहा है। मराठवाड़ा के 76 में से 74 तालुका सूखाग्रस्त घोषित हैं। सितंबर के अंत तक 277 टैंकर 160 गांवों में पानी पहुंचा रहे थे। कृषि विशेषज्ञ विजय बोराडे के मुताबिक, 1972 की तुलना में आज खाद्यान्न उपलब्ध है, लेकिन पानी और पशुओं के चारे की गंभीर कमी है।
सरकार ने राहत का किया ऐलान, किसान मांग रहे पानी
फडणवीस सरकार ने कृषि ऋणों का पुनर्गठन, भू-राजस्व में रियायत, कृषि ऋण वसूली पर रोक और बिजली से जुड़ी राहत घोषित की है। फसल नुकसान का मुआवजा फील्ड असेसमेंट पर निर्भर है। विपक्ष ने तत्काल प्रत्यक्ष आर्थिक सहायता नहीं दिए जाने पर सवाल उठाए हैं। फडणवीस ने केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह से मिलकर NDRF से वित्तीय सहायता मांगी थी। शाह ने केंद्र के सहयोग का आश्वासन दिया। इसके बाद 8 से 11 अक्टूबर के बीच अंतर-मंत्रालयी केंद्रीय टीम ने महाराष्ट्र में नुकसान और राहत जरूरतों का आकलन किया। कृषि आयुक्त सूरज मांढरे के अनुसार, टीम की रिपोर्ट सात दिनों में आने की उम्मीद है।
सोयाबीन, कपास और मक्का जैसी मौसमी फसलें भी सूखे की मार झेल रही हैं, लेकिन बागवानी का नुकसान ज्यादा लंबा असर डाल सकता है। एक मौसमी फसल बर्बाद होने से एक सीजन जाता है, जबकि अंगूर की बेल, अनार या आम का पेड़ सूखने से किसानों की कई वर्षों की मेहनत, निवेश और भविष्य की कमाई खत्म हो सकती है।
ये भी पढ़े: केरल में तेज रफ्तार मिनी कूपर ने स्कूटी को मारी टक्कर, 3 की मौत; आरोपी बोला- ‘पापा सब संभाल लेंगे’

