Asim Munir
Pakistan Army Chief: पाकिस्तान की राजनीति इन दिनों बेहद संवेदनशील मोड़ पर पहुंच गई है। सेना प्रमुख और पाकिस्तान के “सुपर PM” माने जाने वाले आसिम मुनीर अब ऐसे राजनीतिक और धार्मिक संकट में फंसते नजर आ रहे हैं, जिसकी कल्पना भी मुश्किल थी। पाकिस्तान से लेकर अफगानिस्तान तक बड़े-बड़े मौलाना और धार्मिक नेताओं का समर्थन उनसे हट गया है। खुद को असीम शक्ति से लैस समझने वाले मुनीर अब चारों तरफ से घिरते दिखाई दे रहे हैं।
धार्मिक नेताओं की यह मुसीबत सिर्फ पाकिस्तान तक सीमित नहीं है। पाकिस्तान के अंदर मौलानाओं के विरोध के साथ-साथ अफगानिस्तान में भी उनके खिलाफ माहौल तैयार हो चुका है। पाकिस्तान और अफगानिस्तान दोनों जगह के मौलाना मुनीर के खिलाफ एकजुट हो गए हैं। इनका आरोप है कि मुनीर सेना और राजनीति में धर्म के नाम पर अपनी ताकत बढ़ा रहे हैं और आतंकवाद के फैलाव में योगदान दे रहे हैं।
मुनीर के खिलाफ सबसे प्रमुख आवाज उठाई है मौलाना फजल उर रहमान ने। पाकिस्तान के JUI-F अध्यक्ष फजल उर रहमान ने मुनीर की शक्ति और उनके निर्णयों पर गंभीर सवाल उठाए हैं। उनका कहना है कि यदि मुनीर पाकिस्तान में किसी कार्रवाई के लिए खुद को असीम अधिकार देने की कोशिश कर रहे हैं, तो दुनिया इसे कैसे नजरअंदाज कर सकती है। उनके भाषणों और बयानों ने पाकिस्तान में मुनीर विरोधी माहौल और भी तेज कर दिया है।
साथ ही मौलाना मुफ्ती तकी उस्मानी ने भी अपने तीखे बयान में कहा कि पाकिस्तान में सेना और सरकार में बने नए ओहदे और असीम शक्ति से जुड़े कानून पूरी तरह असंवैधानिक हैं। उन्होंने इसे कुरान और इस्लामी तालीम के खिलाफ बताया और कहा कि यह स्थिति हर लिहाज से “अफसोसजनक” है।
मुनीर की परेशानियां अब पाकिस्तान की सीमाओं से बाहर अफगानिस्तान तक फैल चुकी हैं। अफगानिस्तान के गृहमंत्री खलीफा सिराजुद्दीन हक्कानी ने खुले तौर पर मुनीर को चेतावनी दी और कहा कि पाकिस्तान के मौलाना और अफगानिस्तान के धार्मिक नेता मिलकर उनका विरोध कर रहे हैं। हक्कानी ने यह भी कहा कि अफगानिस्तान के प्रति सकारात्मक रुख रखने वाले धार्मिक नेता उनकी सराहना करते हैं, जबकि मुनीर जैसी “असीम महत्वाकांक्षा” रखने वाले नेता विवाद का केंद्र बन चुके हैं।
तालिबान के सर्वोच्च नेता हिब्बतुल्लाह अखुंदजादा और उनके धर्म मामलों के प्रभावशाली चेहरों ने भी मुनीर की असीम शक्ति और उसके दुरुपयोग पर चिंता जताई है। यह स्पष्ट हो रहा है कि पाकिस्तान और अफगानिस्तान के मौलाना मिलकर एक ऐसा गठबंधन बना रहे हैं, जो मुनीर की राजनीतिक और सैन्य महत्वाकांक्षा पर रोक लगा सके।
मुनीर की यह मुसीबत केवल धार्मिक नेताओं तक सीमित नहीं है। अमेरिका के साथ उनके लंच मीटिंग और डील्स ने पाकिस्तान में उनकी शक्ति के दुरुपयोग पर और सवाल खड़े कर दिए हैं। वहीं गाजा संकट और नूर खान एयरबेस पर भारत द्वारा की गई कार्रवाई ने मुनीर की स्थिति और जटिल कर दी है। पाकिस्तान के उप प्रधानमंत्री इशाक डार ने स्वीकार किया कि भारत ने नूर खान एयरबेस पर हमला किया और पाकिस्तान की रणनीति पूरी तरह विफल रही।
इशाक डार के अनुसार, ऑपरेशन सिंदूर के दौरान सेना के जवान बंकर में छिपने को मजबूर हुए। उन्होंने बताया कि उनका प्लान था कि सुबह 4 बजे से अभियान शुरू होगा और 8 बजे तक खत्म होगा, लेकिन भारत के ड्रोन्स और मिसाइल हमले ने पूरी योजना चौपट कर दी। इससे पाकिस्तान की सैन्य और राजनीतिक साख पर भी प्रश्न चिन्ह लग गया।
मुनीर की सबसे बड़ी समस्या उनकी असीम शक्ति और महत्वाकांक्षा है। सेना प्रमुख होते हुए भी वह कूटनीतिक निर्णयों में हस्तक्षेप कर रहे हैं और धर्म के नाम पर अपनी शक्ति बढ़ा रहे हैं। यही कारण है कि पाकिस्तान और अफगानिस्तान के धार्मिक और राजनीतिक नेता उन्हें चारों तरफ से घेर रहे हैं। उनकी महत्वाकांक्षा ने देश की सुरक्षा, क्षेत्रीय स्थिरता और अंतरराष्ट्रीय संबंधों को भी प्रभावित किया है।
विशेषज्ञ मानते हैं कि मुनीर की यह स्थिति एक गंभीर चेतावनी है कि सेना और राजनीति में असीम शक्ति की लालसा कितनी खतरनाक हो सकती है। उनके खिलाफ धार्मिक नेताओं और विपक्षी ताकतों के गठजोड़ ने पाकिस्तान में नए राजनीतिक समीकरण तैयार कर दिए हैं।
मुनीर के विरोध के बावजूद पाकिस्तान के राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी और उप प्रधानमंत्री इशाक डार की स्थिति भी जटिल है। उन्होंने अपने बयान में स्वीकार किया कि भारत ने सैन्य ठिकानों पर हमला किया और पाकिस्तान की योजना विफल रही। यह केवल सैन्य कमजोरी का संकेत नहीं, बल्कि मुनीर की बढ़ती सत्ता और उसकी आलोचना के प्रति अंतरराष्ट्रीय ध्यान भी खींचता है।
असली सवाल यह है कि क्या मुनीर अपने असीम सत्ता के लालच और महत्वाकांक्षा के बावजूद मौलाना और तालिबानी गठबंधन से बाहर निकल पाएंगे? पाकिस्तान और अफगानिस्तान के धार्मिक और राजनीतिक नेताओं का यह गठबंधन उनकी शक्ति पर लगातार दबाव डाल रहा है। उनकी विदेश नीति, सेना और धार्मिक ताकतों के साथ जटिल समीकरण अब उनके राजनीतिक भविष्य को ही तय करेंगे।
मुनीर की यह चुनौती केवल पाकिस्तान तक सीमित नहीं है, बल्कि पूरे क्षेत्र की सुरक्षा और राजनीति को प्रभावित कर सकती है। मौलाना और तालिबान के गठजोड़ ने स्पष्ट कर दिया है कि असीम शक्ति की महत्वाकांक्षा का परिणाम हमेशा आसान नहीं होता। पाकिस्तान और अफगानिस्तान में अब मुनीर के लिए कोई आसान रास्ता नहीं बचा है।
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