Shubhendu Adhikari News: जगतगुरु रामभद्राचार्य महाराज के उत्तराधिकारी आचार्य रामचंद्र दास महाराज ने कोलकाता में पश्चिम बंगाल के वरिष्ठ नेता शुभेंदु अधिकारी से मुलाकात की। इस दौरान दोनों के बीच रामानन्द मिशन के प्रस्तावित आयोजनों के साथ बंगाल की सनातन संस्कृति, परंपराओं और प्रदेश से जुड़े अहम मुद्दों पर चर्चा हुई। आचार्य रामचंद्र दास ने बताया कि इससे पहले दोनों की व्यक्तिगत मुलाकात नहीं हुई थी, हालांकि फोन पर एक-दो बार बातचीत जरूर हुई थी।
‘महाराज, आप संत हैं... मैं स्वयं आपके पास आऊंगा’
आचार्य रामचंद्र दास महाराज के मुताबिक, जब शुभेंदु अधिकारी को उनके कोलकाता प्रवास की जानकारी मिली तो उन्होंने महाराज से मिलने की इच्छा जताई। महाराज ने जब उनसे मिलने आने का समय पूछा तो अधिकारी ने कहा, “महाराज, आप संत हैं। मैं आपको अपने पास नहीं बुला सकता; मैं स्वयं आपके पास दर्शन करने आऊंगा।” आचार्य रामचंद्र दास ने कहा कि शुभेंदु अधिकारी का यह भाव उन्हें छू गया। मुलाकात के दौरान अधिकारी ने कहा, “महाराज, संतों के आशीर्वाद से यहां का हिन्दू बच गया।” इसके जवाब में महाराज ने बंगाल को श्री चैतन्य महाप्रभु, स्वामी विवेकानंद और नेताजी सुभाष चंद्र बोस जैसे महापुरुषों की भूमि बताया, जिन्होंने देश को नई दिशा दी।
‘बंगाल को ऐसे नेतृत्व की जरूरत, जो संस्कृति और अस्मिता को समझे’
आचार्य रामचंद्र दास महाराज ने कहा कि आज बंगाल को ऐसे नेतृत्व की जरूरत है, जो प्रदेश की संस्कृति, परंपरा, अस्मिता और जनभावनाओं को समझकर उसे नई दिशा दे सके। उन्होंने कहा कि शुभेंदु अधिकारी से बातचीत के दौरान उन्हें उनके भीतर इस जिम्मेदारी को निभाने की इच्छाशक्ति और सामर्थ्य नजर आई।
शुभेंदु अधिकारी के संकल्प और आत्मविश्वास की तारीफ
महाराज ने कहा कि आमतौर पर बड़े कार्यों को लेकर चर्चा में कई तरह के सवाल और आशंकाएं सामने आती हैं, लेकिन शुभेंदु अधिकारी के साथ संवाद का अनुभव अलग रहा। उन्होंने अधिकारी के भीतर काम को लेकर स्पष्टता, दृढ़ संकल्प और कुछ कर गुजरने का आत्मविश्वास महसूस किया। आचार्य रामचंद्र दास ने श्रीहनुमान और मां काली से प्रार्थना करते हुए शुभेंदु अधिकारी के अच्छे स्वास्थ्य, दीर्घायु और सामर्थ्य की कामना की, ताकि वे बंगाल की सनातन संस्कृति, गौरव और अस्मिता की रक्षा में योगदान दे सकें। उन्होंने कहा कि रामानन्द मिशन के प्रस्तावित आयोजनों को लेकर हुई यह मुलाकात संत परंपरा और जननेतृत्व के बीच संवाद के लिहाज से महत्वपूर्ण रही।

