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चीन के ‘वाटर बम’ के जवाब में भारत बना रहा सियांग डैम, प्रोटेस्ट क्यों कर रहे अरुणाचल के Gen-Z

by | Oct 26, 2026 | Others

Siang Dam: अरुणाचल प्रदेश में प्रस्तावित 11,200 मेगावाट का सियांग बांध भारत की जल सुरक्षा और चीन की ब्रह्मपुत्र नदी पर बन रही बड़ी परियोजना के संदर्भ में महत्वपूर्ण माना जा रहा है। सरकार का तर्क है कि यह परियोजना पानी के बहाव को नियंत्रित करने, बाढ़ प्रबंधन और बिजली उत्पादन में मदद कर सकती है। लेकिन राज्य के मूल निवासी आदि समुदाय के लोग इसका विरोध कर रहे हैं। उन्हें डर है कि बांध से उनकी पुश्तैनी जमीन, आजीविका, पर्यावरण और सांस्कृतिक विरासत प्रभावित हो सकती है। इसी विवाद के बीच स्थानीय युवाओं और Gen-Z का गुस्सा भी बढ़ा है।

विरोध के बीच हिंसा, इलाके में सुरक्षा बल तैनात

23 अक्टूबर को सियांग बांध के विरोध ने हिंसक रूप ले लिया। स्थानीय नेताओं के घरों, एक पुलिस थाने और सरकारी कंपनी नेशनल हाइड्रोइलेक्ट्रिक पावर कॉरपोरेशन (NHPC) के कार्यालय में तोड़फोड़ और आगजनी की घटनाएं सामने आईं। इसके बाद पूर्वी सियांग जिले में तनाव बना हुआ है और केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बलों को तैनात किया गया है। बांध का विरोध कर रहा आदि समुदायों का प्रमुख संगठन 'आदि बन्ने केबांग' सियांग अपर मल्टीपर्पज प्रोजेक्ट (SUMP) को रद्द करने और इसकी प्रारंभिक व्यवहार्यता रिपोर्ट (PFR) खारिज करने की मांग कर रहा है।

सियांग बांध भारत के लिए क्यों महत्वपूर्ण है

सियांग नदी तिब्बत से निकलती है और अरुणाचल प्रदेश से होकर बहती है। यहां यह स्थानीय समुदायों की आजीविका का अहम आधार है। आगे चलकर यह अन्य नदियों से मिलकर ब्रह्मपुत्र बनाती है, जो असम से होते हुए बांग्लादेश में प्रवेश करती है। तिब्बत में ब्रह्मपुत्र को 'यारलुंग त्सांगपो' कहा जाता है। भारत की रणनीतिक चिंता यह है कि नदी के ऊपरी हिस्से में चीन की बड़ी परियोजनाओं और पानी के बहाव में संभावित बदलावों का निचले इलाकों पर असर पड़ सकता है। प्रस्तावित सियांग बांध को इसी संदर्भ में एक रणनीतिक सुरक्षा उपाय के रूप में देखा जा रहा है। सरकार के अनुसार, परियोजना का उद्देश्य केवल बिजली पैदा करना नहीं, बल्कि पानी के बहाव को नियंत्रित करना और बाढ़ प्रबंधन में सहायता करना भी है।

बांध से बिजली, बाढ़ प्रबंधन और आर्थिक अवसरों की उम्मीद

प्रस्तावित 11,200 मेगावाट की परियोजना से बिजली उत्पादन के साथ पूर्वोत्तर और पूर्वी भारत की ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने में मदद मिलने की उम्मीद है। सरकार का मानना है कि जलाशय पानी के अनिश्चित बहाव को नियंत्रित करने और बाढ़ प्रबंधन में सहायक हो सकता है। इससे अरुणाचल प्रदेश में बुनियादी ढांचे और आर्थिक अवसरों को भी बढ़ावा मिल सकता है। मनोहर पर्रिकर इंस्टीट्यूट फॉर डिफेंस स्टडीज एंड एनालिसिस के नवंबर 2025 के एक पेपर में इस परियोजना को केवल ऊर्जा उत्पादन तक सीमित नहीं माना गया। इसमें इसे भारत की व्यापक जल सुरक्षा और 'हाइड्रो-डिप्लोमेसी' यानी जल-कूटनीति की रणनीति से भी जोड़ा गया है। हालांकि, परियोजना की उपयोगिता और सुरक्षा से जुड़े दावों के साथ इसके पर्यावरणीय, भूवैज्ञानिक और सामाजिक प्रभावों का आकलन भी महत्वपूर्ण है।

आदि समुदाय को पुश्तैनी जमीन डूबने का डर

स्थानीय आदि समुदाय के विरोध की सबसे बड़ी वजह संभावित विस्थापन और अपनी सांस्कृतिक पहचान खोने की आशंका है। लोगों को डर है कि विशाल जलाशय बनने से उनकी पुश्तैनी जमीन डूब सकती है, आजीविका प्रभावित हो सकती है और पर्यावरण को नुकसान पहुंच सकता है। ईटानगर की पत्रकार टोंगम रीना के मुताबिक, सियांग क्षेत्र में परियोजनाओं का विरोध करीब 40 वर्षों से चल रहा है। उनके अनुसार, हालिया बांध परियोजना को लेकर विरोध पिछले तीन वर्षों में और तेज हुआ है। रीना ने यह भी कहा कि महिला प्रदर्शनकारियों पर पुलिस द्वारा आंसू गैस के इस्तेमाल से स्थानीय युवाओं में नाराजगी बढ़ी है। विरोध कर रहे लोगों का कहना है कि वे नदी और उसके स्थानीय प्रभावों को अच्छी तरह समझते हैं। वहीं, प्रदर्शनकारियों को 'राष्ट्र-विरोधी' कहे जाने से भी आक्रोश बढ़ने की बात कही गई है।

प्रारंभिक रिपोर्ट को लेकर क्यों है नाराजगी

सियांग अपर मल्टीपर्पज प्रोजेक्ट की प्रारंभिक व्यवहार्यता रिपोर्ट यानी PFR को लेकर भी विवाद है। सरकार का कहना है कि इसका उद्देश्य यह पता लगाना है कि परियोजना तकनीकी और भूवैज्ञानिक रूप से संभव है या नहीं। इसमें संभावित स्थानों, भूकंप के जोखिम और बाढ़ नियंत्रण की क्षमता का आकलन किया जाना है। लेकिन विरोध कर रहे स्थानीय लोगों को आशंका है कि सर्वेक्षण और प्रारंभिक रिपोर्ट की प्रक्रिया आगे चलकर बांध निर्माण का रास्ता तैयार कर सकती है। उनका मानना है कि एक बार परियोजना आगे बढ़ गई तो उसका विरोध करना और मुश्किल हो जाएगा। सियांग इंडिजिनस फार्मर्स फोरम (SIFF) ने परियोजना को लेकर सरकार के स्थानीय समर्थन संबंधी दावों पर भी सवाल उठाए हैं। संगठन का कहना है कि कुछ परिवारों के हस्ताक्षर पूरे गांवों और पारंपरिक संस्थाओं से व्यापक परामर्श का विकल्प नहीं हो सकते।

सरकार का कहना है, अभी अंतिम फैसला नहीं

अरुणाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री पेमा खांडू ने कहा है कि बांध के निर्माण पर अभी कोई अंतिम फैसला नहीं हुआ है। उनके अनुसार, यदि विशेषज्ञ परियोजना को अनुपयुक्त पाते हैं तो सरकार आगे नहीं बढ़ेगी। खांडू ने स्पष्ट किया है कि परियोजना को आगे ले जाने से पहले पर्यावरण और सामाजिक प्रभाव का आकलन, विस्तृत परियोजना रिपोर्ट, कानूनी मंजूरियां और प्रभावित समुदायों से बातचीत जरूरी होगी। उन्होंने यह भी कहा कि परियोजना को लेकर फैली गलत जानकारी और धारणाओं से स्थानीय लोगों में डर पैदा हो रहा है। 30 सितंबर को मुख्यमंत्री के ऊपरी सियांग जिले के यिंगकियोंग दौरे के दौरान बांध विरोधी प्रदर्शनकारियों ने उनके काफिले को रास्ते में रोक दिया था।

क्या बांध चीन के 'वॉटर बम' को रोक पाएगा

इस परियोजना को लेकर एक बड़ा सवाल यह भी है कि क्या बांध चीन की ओर से नदी के बहाव में किए जाने वाले संभावित बदलावों का असर रोक पाएगा। विरोध कर रहे कुछ लोगों का मानना है कि चीन द्वारा अचानक बड़ी मात्रा में पानी छोड़े जाने की स्थिति में कोई बांध पूरी तरह सुरक्षा नहीं दे सकता। दूसरी ओर, भारत की रणनीतिक चिंता यह है कि नदी के ऊपरी हिस्से में होने वाले बदलावों से निपटने के लिए जल प्रबंधन की तैयारी जरूरी है। हालांकि, प्रस्तावित बांध कितनी सुरक्षा दे सकेगा, यह उसके डिजाइन, संचालन, नदी के प्रवाह और संभावित जोखिमों के वैज्ञानिक आकलन पर निर्भर करेगा।

सियांग बांध का विवाद इस तरह दो अलग-अलग चिंताओं को सामने लाता है। एक ओर सरकार इसे जल सुरक्षा, बिजली और बाढ़ प्रबंधन से जोड़ रही है, तो दूसरी ओर स्थानीय समुदाय अपनी जमीन, आजीविका, पर्यावरण और सांस्कृतिक विरासत को लेकर आशंकित हैं। परियोजना पर आगे बढ़ने के लिए इन चिंताओं और प्रभावित लोगों की भागीदारी को लेकर सहमति अहम होगी।

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