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गृहिणियां ‘नेशन बिल्डर’ हैं मासिक आय 30,000 रुपये तय की: Supreme Court

Supreme Court: सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को कहा कि गृहिणियां या होममेकर देश के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं और वे भारत की समग्र प्रगति की बुनियाद हैं। अदालत ने मोटर दुर्घटना बीमा दावों के लिए गृहिणियों की अनुमानित मासिक आय 30,000 रुपये निर्धारित करते हुए उन्हें "नेशन बिल्डर" और "देश की प्रगति की आधारशिला" बताया।

8.4 लाख से बढ़ाकर 62.78 लाख रुपये किया मुआवजा

जस्टिस संजय करोल और जस्टिस एन. के. सिंह की पीठ ने 25 नवंबर 2001 को सड़क दुर्घटना में एक महिला की मृत्यु के मामले में उसके परिवार को मिलने वाली बीमा राशि को 8.4 लाख रुपये से बढ़ाकर 62.78 लाख रुपये कर दिया। इस मामले में दिसंबर 2023 में मोटर एक्सीडेंट क्लेम्स ट्रिब्यूनल (MACT) ने महिला के कानूनी उत्तराधिकारियों को 2.42 लाख रुपये देने का आदेश दिया था। बाद में दिसंबर 2024 में पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट ने इसे 7.5 प्रतिशत ब्याज के साथ बढ़ाकर 8.43 लाख रुपये कर दिया। इसके बाद मृतका के परिजन सुप्रीम कोर्ट पहुंचे।

गृहिणी का योगदान घर की चारदीवारी तक सीमित नहीं

अपने फैसले में पीठ ने कहा कि गृहिणियों का शारीरिक और भावनात्मक श्रम भले ही घर की चारदीवारी के भीतर दिखाई देता हो, लेकिन उसका प्रभाव कहीं अधिक व्यापक होता है। वे अपने पति और बच्चों को समाज और देश के विकास में योगदान देने योग्य बनाती हैं, इसलिए वे राष्ट्र की समग्र प्रगति की बुनियाद हैं। जस्टिस संजय करोल ने कहा कि किसी गृहिणी की मृत्यु से होने वाला नुकसान केवल पति और बच्चों तक सीमित नहीं होता। इसका असर उसके माता-पिता पर भी पड़ता है, जो अपनी संतान के प्रेम, साथ और सहारे से वंचित हो जाते हैं। इसके अलावा ससुराल पक्ष के सदस्य भी उसकी देखभाल, प्रेम और घरेलू जिम्मेदारियों पर निर्भर रहते हैं। भोजन तैयार करना, दवाइयों का ध्यान रखना, डॉक्टर के पास ले जाना या सुबह की चाय के साथ समय बिताना जैसे कई पहलू ऐसे हैं, जिनका मूल्यांकन केवल गणितीय तरीके से नहीं किया जा सकता।

‘लॉस ऑफ डोमेस्टिक केयर’ के लिए अतिरिक्त राशि देने का निर्देश

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि गृहिणी की मृत्यु से जुड़े मामलों में मोटर एक्सीडेंट क्लेम्स ट्रिब्यूनल, हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट को "लॉस ऑफ डोमेस्टिक केयर" शीर्षक के तहत अतिरिक्त एकमुश्त राशि भी देनी चाहिए। अदालत के अनुसार, यह अतिरिक्त राशि इसलिए जरूरी है क्योंकि मुआवजे की गणना में गृहिणियों की अनुमानित आय अक्सर बहुत कम आंकी जाती है। इस राशि का उद्देश्य घर के सुचारु संचालन में उनके योगदान, बच्चों को मिलने वाले मातृत्व सहयोग, पति को मिलने वाले जीवनसाथी के समर्थन, वयस्क बच्चों की देखभाल और माता-पिता की सेवा व सहयोग के नुकसान की भरपाई करना है।

30 हजार रुपये मासिक आय न्यूनतम मानक

पीठ ने स्पष्ट किया कि 30 हजार रुपये मासिक आय को उन मामलों में न्यूनतम आधार माना जाएगा, जहां गृहिणी की आय का कोई प्रत्यक्ष मौद्रिक प्रमाण उपलब्ध नहीं है। अगर गृहिणी नौकरी या किसी अन्य कार्य से आय अर्जित कर रही थी, तो उसकी वास्तविक आय के अलावा घरेलू देखभाल के नुकसान का अलग से मुआवजा भी जोड़ा जाएगा।

कमाने वाले नहीं, बल्कि परिवार गृहिणी पर निर्भर

अदालत ने कहा कि यह विडंबना है कि गृहिणियों को परिवार के कमाने वाले सदस्यों पर निर्भर माना जाता है, जबकि वास्तविकता इसके उलट है। परिवार का पूरा ढांचा काफी हद तक गृहिणी के श्रम और समर्पण पर टिका होता है। कमाने वाले सदस्य भी उनके योगदान पर निर्भर रहते हैं, लेकिन इस वास्तविकता को वह मान्यता नहीं मिल पाई है जिसकी वह हकदार है।

घरेलू काम अर्थव्यवस्था की रीढ़, लेकिन GDP में नहीं मिलता स्थान

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि खाना बनाना, सफाई करना और बच्चों तथा बुजुर्गों की देखभाल जैसे रोजमर्रा के कार्य भुगतान वाली अर्थव्यवस्था को सहारा देते हैं और उत्पादकता बढ़ाने में अहम भूमिका निभाते हैं। इसके बावजूद इन्हें सकल घरेलू उत्पाद (GDP) जैसे आर्थिक पैमानों में उत्पादक गतिविधि के रूप में मान्यता नहीं मिलती। पीठ ने कहा कि दुनिया भर में प्रतिदिन लगभग 16 अरब घंटे अवैतनिक घरेलू काम और देखभाल संबंधी कार्यों में लगाए जाते हैं, लेकिन पारंपरिक आर्थिक मूल्यांकन पद्धतियां इन योगदानों को नजरअंदाज कर देती हैं।

टाइम यूज सर्वे 2019 का हवाला

अदालत ने 2019 के टाइम यूज सर्वे का भी उल्लेख किया। इस सर्वे के अनुसार 15 से 59 वर्ष की महिलाएं प्रतिदिन सात घंटे से अधिक समय अवैतनिक घरेलू कार्यों में लगाती हैं, जबकि पुरुषों द्वारा ऐसे कार्यों में तीन घंटे से भी कम समय दिया जाता है।

महिलाएं औसतन पुरुषों की तुलना में 2.6 गुना अधिक घरेलू और देखभाल संबंधी जिम्मेदारियां निभाती हैं, जबकि उनमें से कई आय अर्जित करने वाले कार्य भी करती हैं।

महिलाओं की कम श्रम भागीदारी का एक कारण

पीठ ने कहा कि यही असंतुलन संभवतः देश में महिलाओं की श्रम शक्ति भागीदारी दर केवल 31.7 प्रतिशत रहने का एक कारण है। सामाजिक व्यवस्था अब भी यह मानकर चलती है कि घरेलू जिम्मेदारियां स्वतः महिलाओं की ही हैं।

अदालत के अनुसार महिलाओं के अवैतनिक देखभाल संबंधी कार्यों का योगदान भारत की GDP का लगभग 15 से 17 प्रतिशत माना जाता है, लेकिन इसके बावजूद उन्हें न तो भुगतान मिलता है और न ही उचित पहचान।

गृहिणियों के श्रम का मूल्यांकन करने के तरीके

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इस अंतर को कम करने के लिए विभिन्न तरीकों का उपयोग किया जा रहा है।

'रिप्लेसमेंट कॉस्ट एप्रोच' के तहत यह देखा जाता है कि यदि इन्हीं कामों के लिए बाहर से मदद ली जाए तो उसकी लागत कितनी होगी। वहीं 'ऑपर्च्युनिटी कॉस्ट एप्रोच' में यह आंका जाता है कि घरेलू जिम्मेदारियों के कारण महिलाओं ने श्रम बाजार में भाग लेकर कितनी संभावित आय का त्याग किया।

‘हाउसवाइफ’ से ‘होममेकर’ तक का बदलाव

अदालत ने कहा कि अब केवल आर्थिक दृष्टिकोण ही नहीं, बल्कि सामाजिक सोच में भी बदलाव आया है। शादीशुदा महिला को केवल "हाउसवाइफ" कहने के बजाय अब "होममेकर" कहा जाता है, जो घर और परिवार के अनेक पहलुओं को संभालने में उनकी बहुआयामी भूमिका को सम्मान देने का प्रतीक है।

मानव पूंजी के निर्माण में महिलाओं की भूमिका

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि महिलाओं का योगदान केवल जैविक रूप से बच्चों को जन्म देने तक सीमित नहीं है। वे मानव पूंजी के निर्माण और विकास में केंद्रीय भूमिका निभाती हैं, जो भारत के आर्थिक और सामाजिक लक्ष्यों की नींव है।

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Tanisha Verma

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