वैवाहिक बलात्कार को अपराध बनाने की मांग पर सुप्रीम कोर्ट में तीन सप्ताह बाद अंतिम बहस होगी।
नई दिल्ली: वैवाहिक बलात्कार को अपराध की श्रेणी में शामिल करने की मांग पर सुप्रीम कोर्ट में बुधवार को महत्वपूर्ण सुनवाई हुई. मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने इस मामले को व्यक्तिगत स्वतंत्रता, महिलाओं के अधिकार और आपराधिक कानून से जुड़े संवैधानिक सवालों से जोड़कर देखा.
अदालत ने सुनवाई के दौरान स्पष्ट किया कि विवाह किसी व्यक्ति की व्यक्तिगत स्वायत्तता को समाप्त नहीं करता. हालांकि, मौजूदा कानून में वैवाहिक बलात्कार को लेकर जो अपवाद मौजूद है, उसके संवैधानिक पहलुओं पर भी विचार किया जाएगा. सुप्रीम कोर्ट ने मामले की अंतिम सुनवाई तीन सप्ताह बाद तय की है.
सुनवाई के दौरान पीठ ने कहा कि संविधान को उसके अलग-अलग प्रावधानों में बांटकर नहीं देखा जा सकता. व्यक्तिगत स्वतंत्रता से जुड़े अनुच्छेद 21 और आपराधिक कानून से जुड़े अनुच्छेद 20 के प्रभावों को एक साथ समझना होगा.
अदालत का मानना है कि वैवाहिक बलात्कार के मामले में व्यक्तिगत अधिकारों के साथ-साथ आपराधिक कानून के मौजूदा प्रावधानों और संवैधानिक सुरक्षा को भी ध्यान में रखना जरूरी है.
सुप्रीम कोर्ट ने इस बात पर जोर दिया कि शादी के बाद भी किसी व्यक्ति की व्यक्तिगत स्वायत्तता खत्म नहीं हो जाती. यही सवाल इस पूरे मामले के केंद्र में है.
हालांकि, मौजूदा कानून में पति और पत्नी के बीच यौन संबंध को लेकर वैवाहिक अपवाद मौजूद है. अब अदालत को यह तय करना है कि यह अपवाद संविधान के अनुरूप है या नहीं और इसके रहते किसी पति के खिलाफ बलात्कार के आरोप में कानूनी कार्रवाई किस स्थिति में संभव हो सकती है.
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने यह अहम सवाल उठाया कि जब संसद ने किसी विशेष कृत्य को बलात्कार की कानूनी परिभाषा से बाहर रखा है, तो क्या अदालत केवल कानून की व्याख्या करके उसे दोबारा उसी अपराध के दायरे में ला सकती है.
इस सवाल का संबंध संविधान के अनुच्छेद 20(1) से भी है. यह प्रावधान व्यक्ति को ऐसे कृत्य के लिए दंडित किए जाने से सुरक्षा देता है, जो किए जाने के समय कानून के तहत अपराध नहीं था.
पीठ ने यह भी कहा कि इस तरह के मामलों में आपराधिक मंशा और व्यक्ति की जवाबदेही जैसे पहलुओं पर विचार करना होगा. अदालत ने संकेत दिया कि कानून की ऐसी व्याख्या नहीं होनी चाहिए जिससे लोगों के सामने ऐसी अप्रत्याशित कानूनी स्थिति पैदा हो, जिसकी उन्हें पहले से जानकारी न हो.
यानी मामले में केवल महिला के अधिकार और वैवाहिक संबंधों का सवाल नहीं है, बल्कि आपराधिक कानून के सिद्धांत और संवैधानिक सीमाएं भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगी.
सुप्रीम कोर्ट के सामने फिलहाल दो प्रमुख कानूनी सवाल हैं. पहला, अगर वैवाहिक बलात्कार से जुड़ा मौजूदा अपवाद कानून में बना रहता है, तो क्या इसके बावजूद पति के खिलाफ बलात्कार का मुकदमा चलाया जा सकता है.
दूसरा सवाल यह है कि पति को पत्नी के साथ बलात्कार के आरोप से बचाने वाला मौजूदा वैवाहिक अपवाद संविधान के अनुरूप है या नहीं.
केंद्र सरकार की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने दलील दी कि वैवाहिक बलात्कार को अपराध घोषित करने का फैसला विधायिका और कार्यपालिका के नीतिगत क्षेत्र से जुड़ा है.
वहीं याचिकाकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ वकील करुणा नंदी ने तर्क दिया कि केवल विवाह के आधार पर पति को पत्नी की इच्छा के खिलाफ यौन संबंध बनाने पर आपराधिक जिम्मेदारी से छूट नहीं मिलनी चाहिए.
अब सुप्रीम कोर्ट तीन सप्ताह बाद मामले की अंतिम बहस सुनेगा. इसके बाद इस संवेदनशील और लंबे समय से चले आ रहे कानूनी विवाद पर अदालत की दिशा और स्पष्ट हो सकती है.
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