अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप इन दिनों चीन के अहम दौरे पर हैं, लेकिन उनकी यात्रा शुरू होने से पहले ही ताइवान मुद्दे को लेकर अमेरिका और चीन के बीच तनाव खुलकर सामने आ गया। चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने साफ शब्दों में कहा है कि ताइवान चीन का आंतरिक मामला है और इस मुद्दे पर किसी भी तरह की दखलअंदाजी स्वीकार नहीं की जाएगी। वहीं अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने भी दो टूक कहा कि ताइवान को लेकर अमेरिका की नीति में कोई बदलाव नहीं होने वाला है।
दिलचस्प बात यह है कि कुछ समय पहले तक डोनाल्ड ट्रंप चीन पर टैरिफ लगाने और कोरोना वायरस को “चाइनीज वायरस” कहने को लेकर लगातार हमलावर थे, लेकिन अब बीजिंग पहुंचकर उन्होंने शी जिनपिंग को “महान देश का महान नेता” बताया है। ऐसे में ट्रंप का यह दौरा वैश्विक राजनीति में काफी अहम माना जा रहा है।
ताइवान को लेकर चीन और अमेरिका के बीच बढ़ती तनातनी दुनिया की सबसे बड़ी भू-राजनीतिक चुनौतियों में शामिल हो चुकी है। चीन के पूर्वी तट से करीब 128 किलोमीटर दूर स्थित ताइवान छोटा द्वीप जरूर है, लेकिन रणनीतिक और आर्थिक रूप से इसकी अहमियत बेहद बड़ी है। शी जिनपिंग ने ट्रंप के दौरे से पहले चेतावनी देते हुए कहा कि यदि ताइवान मुद्दे को सही तरीके से नहीं संभाला गया तो दोनों देशों के बीच टकराव की स्थिति पैदा हो सकती है।
चीन की कम्युनिस्ट सरकार ताइवान को अपने हिस्से का प्रांत मानती है। राष्ट्रपति शी जिनपिंग कई बार यह संकेत दे चुके हैं कि जरूरत पड़ने पर ताइवान को चीन में मिलाने के लिए बल प्रयोग भी किया जा सकता है। दूसरी तरफ ताइवान खुद को एक स्वतंत्र लोकतांत्रिक राष्ट्र मानता है, जिसकी अपनी सरकार और सेना है।
अमेरिका की स्थिति इस मुद्दे पर काफी संतुलित लेकिन जटिल रही है। अमेरिका “वन चाइना पॉलिसी” को मानता जरूर है, लेकिन उसने कभी ताइवान पर चीन के दावे को औपचारिक मान्यता नहीं दी। 1979 के ताइवान रिलेशंस एक्ट के तहत अमेरिका ताइवान को आत्मरक्षा के लिए हथियार उपलब्ध कराने के लिए प्रतिबद्ध है। हालांकि अमेरिका ने हमेशा “रणनीतिक अस्पष्टता” की नीति अपनाई है, यानी उसने कभी स्पष्ट नहीं किया कि चीन के हमले की स्थिति में वह सीधे सैन्य हस्तक्षेप करेगा या नहीं।
विशेषज्ञों का मानना है कि अगर चीन ताइवान पर नियंत्रण हासिल कर लेता है तो उसकी पहुंच सीधे प्रशांत महासागर तक मजबूत हो जाएगी, जो अमेरिका के लिए एशिया-प्रशांत क्षेत्र में बड़ी रणनीतिक चुनौती बन सकती है। यही वजह है कि दुनिया की निगाहें ताइवान पर टिकी हुई हैं।
राजनीतिक महत्व के अलावा ताइवान वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए भी बेहद अहम है। दुनिया में इस्तेमाल होने वाले अधिकांश सेमीकंडक्टर चिप्स ताइवान में बनाए जाते हैं। मोबाइल फोन, लैपटॉप, कार, घरेलू उपकरण और आधुनिक हथियारों तक में इन चिप्स का इस्तेमाल होता है। ऐसे में यदि ताइवान में युद्ध जैसी स्थिति बनती है या सप्लाई चेन बाधित होती है तो पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था प्रभावित हो सकती है।
इस बीच ट्रंप और जिनपिंग की बातचीत में मिडिल ईस्ट और स्ट्रेट ऑफ होर्मुज का मुद्दा भी प्रमुख रहा। ट्रंप का कहना है कि चीन ने अमेरिका और ईरान के बीच तनाव कम कराने में मदद की पेशकश की है। चीन, ईरानी तेल का सबसे बड़ा खरीदार माना जाता है और दोनों देशों के बीच गहरे आर्थिक संबंध हैं।
बताया जा रहा है कि ट्रंप चाहते हैं कि चीन ईरान पर दबाव बनाए ताकि होर्मुज स्ट्रेट दोबारा सामान्य रूप से खुल सके। हालांकि अमेरिकी प्रशासन के भीतर इस मुद्दे पर अलग-अलग राय सामने आ रही है। विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने कहा कि अमेरिका ने चीन से किसी तरह की मदद नहीं मांगी है। उनके मुताबिक अमेरिका केवल चीन को अपना रुख स्पष्ट करना चाहता था, क्योंकि ईरान और होर्मुज संकट इस समय वैश्विक राजनीति के केंद्र में हैं।
ये भी पढ़ें: PM मोदी का 5 देशों का दौरा शुरू, UAE में होंगे कई अहम समझौते
Silver Price Today: चांदी की कीमतों में आज नरमी देखने को मिली है। भारत में…
Vande Bharat Chair Car: वंदे भारत ट्रेन के नए चेयर कार रेक ने हाई-स्पीड ट्रायल…
jamshedpur Marine Drive Accident: झारखंड के जमशेदपुर में गुरुवार तड़के रफ्तार का कहर देखने को…
IPL 2027 Auction: आईपीएल 2027 की नीलामी को लेकर बड़ा अपडेट सामने आया है। भारतीय…
India Pakistan Conflict: अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने भारत और पाकिस्तान के बीच विवाद…
Asian Games 2026 India Rowing: भारत के लिए एशियन गेम्स 2026 में छठे दिन मेडल…