Supreme Court
Supreme Court: देशभर के अदालत परिसरों में फैली गंदगी और शौचालयों की बदतर स्थिति पर सुप्रीम कोर्ट ने कड़ी नाराजगी जताई है। उच्च न्यायालयों की ओर से प्रस्तुत की गई स्थिति रिपोर्ट में यह साफ हुआ है कि अधिकांश अदालत परिसरों में शौचालयों की हालत बेहद खराब है। अदालत ने कहा कि ऐसी स्थिति न केवल प्रशासनिक विफलता को दर्शाती है, बल्कि यह अदालत में आने वाले नागरिकों, वकीलों और कर्मचारियों के मौलिक अधिकारों और गरिमा का भी उल्लंघन करती है।
रिपोर्ट में बताया गया कि यहां तक कि दिल्ली, मुंबई और चेन्नई जैसे मेट्रो शहरों के उच्च न्यायालयों में भी साफ-सफाई और रखरखाव का हाल चिंताजनक है। कई स्थानों पर सफाई कर्मियों की नियुक्ति तो की गई है, लेकिन रखरखाव के ठेकेदारों की जवाबदेही तय नहीं की जाती। रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि प्रशासनिक ढांचे में पारदर्शिता की कमी और बजट का दुरुपयोग इस समस्या को और बढ़ा रहा है।
सार्वजनिक स्वास्थ्य और स्वच्छता में यह असफलता सीधे तौर पर नागरिकों के स्वास्थ्य, सुरक्षा और गरिमा को प्रभावित करती है। अदालत ने कहा कि जब न्याय के मंदिर कहे जाने वाले स्थानों की ऐसी हालत हो, तो यह पूरी न्याय व्यवस्था की साख पर प्रश्नचिन्ह है।
रिपोर्ट में यह भी सामने आया कि विकलांग व्यक्तियों के लिए अदालत परिसरों में आवश्यक सुविधाएं लगभग न के बराबर हैं। कई जिलों और उच्च न्यायालयों में रैंप, सहारा देने वाली बार, और व्हीलचेयर के लिए पर्याप्त जगह तक नहीं है। यह स्थिति विकलांग अधिकार अधिनियम के तहत समानता और गैर-भेदभाव के अधिकार का उल्लंघन करती है। इतना ही नहीं, ट्रांसजेंडर समुदाय के लिए अलग या जेंडर न्यूट्रल शौचालयों की भी भारी कमी है। अदालत ने कहा कि यह समुदाय की गरिमा और उनके मौलिक अधिकारों की पूरी तरह अनदेखी है।
इतना ही नहीं महिला वकीलों और कर्मचारियों के लिए क्रेच और बच्चों की देखभाल की सुविधाओं की अनुपस्थिति को भी अदालत ने गंभीर मुद्दा बताया। सुप्रीम कोर्ट का कहना है कि ऐसी परिस्थितियां महिलाओं के पेशेवर अधिकारों में बाधा डालती हैं और न्यायिक सेवा में लिंग समानता को कमजोर करती हैं। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि उपसंचालन न्यायपालिका, यानी निचली अदालतों में स्थिति और भी भयावह है। ग्रामीण क्षेत्रों में तो न केवल शौचालयों की हालत खराब है, बल्कि स्वच्छ पेयजल और बुनियादी सुविधाओं का भी अभाव है।
अदालत ने राज्य सरकारों और केंद्र शासित प्रदेशों को पहले ही आदेश दिया था कि सभी अदालत परिसरों में पुरुष, महिला, विकलांग और ट्रांसजेंडर व्यक्तियों के लिए अलग और साफ-सुथरे शौचालय उपलब्ध कराए जाएं। सुप्रीम कोर्ट ने चेतावनी दी है कि अगर इस दिशा में जल्द सुधार नहीं हुआ तो इसे अदालत में आने वाले नागरिकों की गरिमा के खिलाफ अपराध माना जाएगा।
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