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सपा के रंग में आया बदलाव, अखिलेश के नीले गमछे से छात्र सभा तक; दलित वोट पर नजर?

उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव की तैयारियों के बीच समाजवादी पार्टी की राजनीति में नया बदलाव नजर आ रहा है। पार्टी अब अपने पारंपरिक लाल रंग से आगे बढ़ती दिख रही है।

सपा प्रमुख अखिलेश यादव हाल ही में नीले गमछे में नजर आए। इसके बाद पार्टी की छात्र सभा के लिए भी नीले रंग का ड्रेस कोड तय किया गया है।

सपा के इस फैसले को केवल कपड़ों में बदलाव के तौर पर नहीं देखा जा रहा। इसके पीछे पार्टी की सामाजिक और चुनावी रणनीति भी मानी जा रही है।

छात्र सभा के लिए बदला ड्रेस कोड

समाजवादी पार्टी ने छात्र सभा के पदाधिकारियों और कार्यकर्ताओं के लिए नया ड्रेस कोड तय किया है।

अब उन्हें नीली शर्ट और नीली पैंट पहनने का निर्देश दिया गया है। इसके अलावा नीली टी-शर्ट और नीली जींस का विकल्प भी रखा गया है।

लखनऊ में होने वाले छात्र सभा के सम्मेलन में कार्यकर्ता इसी नए ड्रेस में दिखाई देंगे।

पार्टी के इस फैसले की चर्चा राजनीतिक गलियारों में भी हो रही है।

लाल से नीले रंग की ओर क्यों बढ़ी सपा?

समाजवादी पार्टी की पहचान लंबे समय से लाल टोपी और लाल गमछे से जुड़ी रही है। पार्टी के नेता अक्सर सफेद कुर्ते के साथ लाल रंग की टोपी या गमछे में दिखाई देते हैं।

दूसरी ओर नीला रंग दलित राजनीति से जुड़ा माना जाता है। बहुजन समाज पार्टी और डॉ. भीमराव आंबेडकर की विचारधारा के साथ भी इसका गहरा संबंध रहा है।

ऐसे में सपा का नीले रंग को अपनाना राजनीतिक तौर पर अहम माना जा रहा है।

अखिलेश यादव भी नीले गमछे में दिखे

लखनऊ में सपा के जिला और महानगर अध्यक्षों की बैठक हुई थी। इस दौरान अखिलेश यादव और शिवपाल यादव नीले गमछे में नजर आए।

इससे पहले सपा नेताओं के बीच लाल रंग वाले गमछे ज्यादा दिखाई देते थे।

अब छात्र सभा के लिए नीले रंग का ड्रेस कोड तय होने के बाद पार्टी की रणनीति को लेकर चर्चाएं और तेज हो गई हैं।

दलित युवाओं पर सपा की नजर?

अखिलेश यादव पिछले कुछ समय से पार्टी के पारंपरिक वोट समीकरण को विस्तार देने की कोशिश कर रहे हैं।

सपा की राजनीति में पिछड़ा और अल्पसंख्यक वर्ग लंबे समय से महत्वपूर्ण रहा है। अब पार्टी दलित मतदाताओं के बीच भी अपनी पकड़ मजबूत करना चाहती है।

इसी रणनीति को पीडीए फॉर्मूले से जोड़कर देखा जा रहा है। पीडीए में पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक वर्ग शामिल हैं।

2024 के लोकसभा चुनाव में सपा ने इन वर्गों के मुद्दों को प्रमुखता से उठाया था। अब पार्टी इसी आधार को आगे बढ़ाने की कोशिश कर रही है।

बसपा के वोट बैंक में सेंध की कोशिश?

उत्तर प्रदेश में दलित वोट लंबे समय तक बसपा का मजबूत आधार माना जाता रहा है।

सपा अब इस वोट बैंक में अपनी हिस्सेदारी बढ़ाना चाहती है। इसके लिए पार्टी सीधे दलित युवाओं और छात्रों तक पहुंच बनाने की कोशिश कर रही है।

छात्र राजनीति इस रणनीति का अहम हिस्सा हो सकती है। कॉलेज और विश्वविद्यालयों में सक्रिय युवाओं के बीच पार्टी अपनी नई पहचान बनाने की कोशिश कर रही है।

नीले रंग के जरिए क्या संदेश?

नीला रंग सिर्फ राजनीतिक पहचान तक सीमित नहीं है। इसे आंबेडकरवादी आंदोलन और सामाजिक न्याय से भी जोड़ा जाता है।

सपा इसी प्रतीक के जरिए दलित और पिछड़े युवाओं तक पहुंचने का संदेश दे सकती है।

पार्टी की कोशिश अपनी पुरानी छवि को व्यापक सामाजिक न्याय की राजनीति से जोड़ने की भी हो सकती है।

2024 के बाद रणनीति को आगे बढ़ाने की तैयारी

2024 के लोकसभा चुनाव में सपा ने संविधान, आरक्षण और पीडीए जैसे मुद्दों पर जोर दिया था।

इस रणनीति से पार्टी को चुनाव में फायदा मिला। अब अखिलेश यादव इस समर्थन को आगे भी बनाए रखना चाहते हैं।

2027 के विधानसभा चुनाव को देखते हुए सपा अपने सामाजिक समीकरण को और मजबूत करने की कोशिश कर रही है।

क्या नीला रंग सपा की नई पहचान बनेगा?

अभी यह कहना जल्दबाजी होगी कि सपा अपनी पूरी राजनीतिक पहचान बदलने जा रही है।

हालांकि, अखिलेश यादव का नीले गमछे में दिखना और छात्र सभा के लिए नीला ड्रेस कोड तय करना एक साथ जरूर महत्वपूर्ण संकेत हैं।

सपा अगर नीले रंग को सामाजिक न्याय और दलित युवाओं से जोड़ने में सफल रहती है, तो इससे पार्टी के चुनावी समीकरण पर असर पड़ सकता है।

फिलहाल अखिलेश यादव की कोशिश साफ दिखाई दे रही है। वह सपा के पारंपरिक आधार से आगे बढ़कर नए सामाजिक वर्गों को पार्टी के साथ जोड़ना चाहते हैं।

Ayush Chaudhary

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