दुनिया

ग्रीनलैंड पर अमेरिका की नजर, डेनमार्क फंसा अपने ही तर्क में! क्या NATO टूटने की कगार पर?

Greenland Takeover Threat: अंतरराष्ट्रीय राजनीति में कभी-कभी इतिहास ऐसे लौटता है कि पुराने फैसले ही आज सबसे बड़ा बोझ बन जाते हैं। डेनमार्क आज ठीक उसी मोड़ पर खड़ा दिख रहा है। ग्रीनलैंड को लेकर अमेरिका की बढ़ती आक्रामकता ने न सिर्फ डेनमार्क की संप्रभुता पर सवाल खड़े किए हैं, बल्कि NATO जैसे शक्तिशाली सैन्य गठबंधन के भविष्य को भी संकट में डाल दिया है।

क्या है पूरा मामला

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा ग्रीनलैंड पर पूर्ण नियंत्रण की खुली इच्छा ने यूरोप की नींद उड़ा दी है। डेनमार्क के लिए यह हालात किसी ‘कर्मफल’ से कम नहीं लगते। वजह 1974 का साइप्रस संकट है, जब NATO के दो सदस्य ग्रीस और तुर्की युद्ध के मुहाने पर थे। उस वक्त डेनमार्क ने ही यह तर्क दिया था कि NATO एक सदस्य देश को दूसरे सदस्य से बचाने के लिए बाध्य नहीं है। आज वही तर्क डेनमार्क के खिलाफ खड़ा हो गया है।

क्यों है ग्रीनलैंड अहम

ग्रीनलैंड, जो रणनीतिक रूप से बेहद अहम है, पर अमेरिका की नजर सिर्फ भू-राजनीतिक नहीं बल्कि सैन्य और आर्थिक भी है। ट्रंप की धमकियों के बाद ब्रिटेन और नॉर्वे ने प्रतीकात्मक तौर पर कुछ सैनिक डेनमार्क के समर्थन में भेजे, लेकिन यह समर्थन अमेरिका को और नाराज कर गया। जवाब में ट्रंप ने यूरोपीय देशों पर 10 प्रतिशत टैरिफ लगाने का ऐलान कर दिया। सबसे बड़ा सवाल NATO की भूमिका पर है। अनुच्छेद-5 केवल बाहरी हमले की स्थिति में सुरक्षा देता है, लेकिन जब खतरा गठबंधन के भीतर से आए, तो चार्टर खामोश हो जाता है। यही वजह है कि डेनमार्क आज खुद को लगभग अकेला महसूस कर रहा है।

क्या है समस्या

स्थिति और भी चिंताजनक इसलिए है क्योंकि अमेरिका दुनिया की सबसे बड़ी सैन्य शक्ति है, जबकि डेनमार्क का रक्षा बजट बेहद सीमित है। यदि अमेरिका ने ग्रीनलैंड पर बल प्रयोग किया, तो NATO के लिए हस्तक्षेप करना लगभग असंभव होगा। स्पेन के प्रधानमंत्री पेड्रो सांचेज इस संकट को NATO के लिए “मौत की घंटी” बता चुके हैं, जबकि गठबंधन के प्रमुख मार्क रुट की चुप्पी कई सवाल खड़े कर रही है। वहीं ग्रीनलैंड के मूल निवासी इनुइट समुदाय अपनी पहचान और स्वायत्तता को लेकर आशंकित हैं।

आज सवाल सिर्फ ग्रीनलैंड का नहीं, बल्कि उस व्यवस्था का है जो दशकों से पश्चिमी दुनिया की सुरक्षा की रीढ़ रही है। अगर दोस्त ही दुश्मन बन जाए, तो क्या NATO वाकई किसी को बचा पाएगा?

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Shagun Chaurasia

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