Amit Shah: भारतीय राजनीति में समय के साथ सत्ता बदलती रहती है, लेकिन कई बार राजनीतिक तर्क और विरोध के तरीके लगभग वैसे ही बने रहते हैं। वर्ष 2011 और 2026 की घटनाओं की तुलना करें तो यह बात साफ दिखाई देती है। दोनों ही मामलों में पुलिस कार्रवाई के बाद संसद में हंगामा हुआ और गृह मंत्री की जवाबदेही को लेकर विपक्ष ने इस्तीफे की मांग उठाई। फर्क सिर्फ इतना है कि 2011 में यह मांग भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) उठा रही थी, जबकि 2026 में यही भूमिका कांग्रेस निभा रही है।
साल 2011 में मानसून सत्र के दौरान भारतीय जनता युवा मोर्चा (BJYM) के कार्यकर्ताओं का प्रदर्शन पुलिस कार्रवाई के बाद बड़ा राजनीतिक मुद्दा बन गया था। उस समय बीजेपी विपक्ष में थी और उसने तत्कालीन केंद्रीय गृह मंत्री पी. चिदंबरम को घटना के लिए जिम्मेदार ठहराते हुए उनके इस्तीफे की मांग की थी। बीजेपी नेताओं का तर्क था कि कानून-व्यवस्था और पुलिस गृह मंत्रालय के दायरे में आते हैं, इसलिए पुलिस की कार्रवाई की नैतिक जिम्मेदारी गृह मंत्री को लेनी चाहिए। उस दौरान संसद में जोरदार विरोध प्रदर्शन हुए और विपक्ष ने इस मुद्दे पर सरकार को घेरने में कोई कसर नहीं छोड़ी।
अब 2026 में तस्वीर बदल चुकी है। बीजेपी केंद्र की सत्ता में है और कांग्रेस विपक्ष की भूमिका में है। 20 जुलाई को संसद की ओर मार्च कर रहे छात्रों पर पुलिस द्वारा बल प्रयोग किए जाने के बाद कांग्रेस और अन्य विपक्षी दलों ने केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह को निशाने पर लिया है। विपक्ष का कहना है कि यदि पुलिस कार्रवाई गृह मंत्रालय के अधीन हुई है तो उसकी जवाबदेही भी गृह मंत्री पर तय होनी चाहिए। यही कारण है कि कांग्रेस लगातार अमित शाह से नैतिक जिम्मेदारी लेने की मांग कर रही है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि दोनों घटनाओं में सबसे दिलचस्प पहलू यह है कि सत्ता और विपक्ष की भूमिकाएं बदल गई हैं, लेकिन तर्क लगभग वही हैं। 2011 में बीजेपी जिन सिद्धांतों के आधार पर जवाबदेही की मांग कर रही थी, आज कांग्रेस उन्हीं सिद्धांतों का हवाला देकर सरकार को घेर रही है। इससे यह बहस फिर तेज हो गई है कि क्या राजनीतिक दल सत्ता में आने के बाद भी वही मानदंड अपनाते हैं, जिनकी मांग वे विपक्ष में रहते हुए करते हैं।
छात्र प्रदर्शन और पुलिस कार्रवाई को लेकर संसद के अंदर और बाहर राजनीतिक माहौल लगातार गर्म बना हुआ है। विपक्ष इस मुद्दे को प्रमुखता से उठाने की तैयारी में है, जबकि सरकार अपनी स्थिति स्पष्ट कर चुकी है। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि आने वाले दिनों में यह मुद्दा संसद की कार्यवाही और राजनीतिक बहस का प्रमुख विषय बना रह सकता है।
इस पूरे विवाद ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि पुलिस कार्रवाई की स्थिति में मंत्री स्तर पर जवाबदेही कैसे तय की जानी चाहिए। विपक्ष इसे लोकतांत्रिक जवाबदेही का मामला बता रहा है, जबकि सरकार का पक्ष अलग है।
2011 और 2026 की घटनाएं यह दिखाती हैं कि भारतीय राजनीति में सत्ता बदल सकती है, लेकिन जवाबदेही और विरोध की राजनीति से जुड़े सवाल बार-बार लौटकर सामने आते हैं। अब नजर इस बात पर होगी कि संसद और राजनीतिक दल इस बहस को किस दिशा में ले जाते हैं और जनता इसे किस नजरिए से देखती है।
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