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महाराष्ट्र के नगर निगम चुनाव में बीजेपी+ की जीत और MVA की हार के पीछे ये हैं बड़े कारण

Reasons behind BJP+ victory: मुंबई की राजनीति में निर्णायक मोड़ आ गया है क्योंकि BJP ने उद्धव ठाकरे की पार्टी के बिना ही पहली बार बहुमत पा लिया है। बीएमसी चुनाव में बीजेपी पहले बार बड़ी पार्टी बनकर उभरी है जबकि शिवसेना यूबीटी दूसरी बड़ी पार्टी रही। विश्लेषण में जानिए वो बड़े 5 कारण जो बीजेपी और उसके सहयोगी दलों के जीत का मूल मंत्र बना और एमवीए यानी महाविकास अघाड़ी के खराब प्रदर्शन की वजह बना।

बीजेपी+ ने विकास के मुद्दे रखें और जनता भरोसा जीता

बीजेपी की लीडरशिप वाली महायुति ने BMC चुनाव में साफ और आक्रामक तरीके से विकास के एजेंडे को जनता के सामने रखा। उसने मेट्रो, सड़कें, क्लस्टर रीडेवलपमेंट, झुग्गी के पुनर्विकास और जरूरी सेवाओं को फोकस में रखकर यह मैसेज दिया कि बीएमसी में मुंबई की जनता अब सिर्फ सियासत नहीं, बल्कि प्रोफेशनल अर्बन एडमिनिस्ट्रेशन चाहती है। यह मुद्दा शहर के मिडिल क्लास और यंग वोटर्स में गहराई तक पैठ बन गया और उसे अपने पक्ष में वोट में तब्दील करवा लिया।

ठाकरे बंधुओं के लिए गेमचेंजर नहीं बना एक-दूसरे का साथ

20 साल बाद उद्धव और राज ठाकरे एक साथ आए और अपनी-अपनी पार्टियों का गठबंधन करके BMC चुनाव में उतरे। लेकिन ये भी काम नहीं आया। ठाकरे बंधुओं की एकता धरी की धरी रह गई और बीजेपी के महायुति गठबंधन ने उन्हें बीएमसी की सत्ता से बाहर कर दिया। ठाकरे बंधु अपने साथ आने को चुनावी गेमचेंजर मानकर चल रहे थे लेकिन यह सियासी प्रयोग जमीन पर असर दिखा नहीं पाया। ठाकरे बंधुओं का गठबंधन, मतदाताओं को यह विश्वास नहीं दिला पाया कि वह BMC को अच्छी तरह से चलाने में सफल हो सकते हैं। BMC चुनाव में उनकी इमोशनल अपील भी फीकी पड़ गई।

वोटर्स को लुभा नहीं पाए चाचा-भतीजा

एनसीपी का दोनों गुट एक-साथ आकर चुनाव मैदान उतरा में था। लेकिन वे अपने पारंपरिक प्रभाव वाले इलाकों में वोटरों को प्रभावित करने में नाकाम रहे। पिछले एक दशक में पुणे के मतदाताओं का मिजाज काफी बदला है। मध्यम वर्ग और नए वोटर विरासत की राजनीति के बजाय शासन, इन्फ्रास्ट्रक्चर और राष्ट्रीय नैरेटिव को महत्व दिया। वहीं दोनों पवार का संयुक्त प्रचार भी इस बदलाव के मुकाबले में ठोस विजन पेश करने में फेल साबित हुआ है।

चुनाव में नहीं चला मराठी कार्ड, नतीजा वोटबैंक बंटा

बीएमसी चुनाव में मराठी वोट एकजुटता का कार्ड नहीं चला। वह शिवसेना (यूबीटी) और राज ठाकरे की पार्टी एमएनएस और बीजेपी-शिवसेना शिंदे गुट की महायुति के बीच बंट गया। इसकी वजह से BJP को बड़ा फायदा हुआ। महायुति ने इसी विभाजन का लाभ उठाया और गैर-परंपरागत वोटरों के साथ मराठी वोटर्स के बड़े हिस्से को भी अपने पक्ष में कर लिया।

बीजेपी का माइक्रो-मैनेजमेंट फिर आया काम

बीजेपी ने साबित कर दिया कि उसका माइक्रो मैनेजमेंट लोकसभा व विधानसभा के अलावा नगर निकाय चुनाव में भी मजबूत है। उसने ठाकरे बंधुओं की तरह इमोशनल अपील की जगह बूथ लेवल प्लानिंग, डेटा बेस्ड कैंपेन और लोकल मुद्दों पर फोकस किया। इन सभी ने महायुति को ठाकरे बंधुओं के गठबंधन पर बढ़त दिला दी। BMC चुनाव में BJP के नेतृत्व वाले गठबंधन महायुति के लिए उनकी पार्टियों की संगठनात्मक ताकत भी बहुत काम आई।

विपक्ष में बिखराव का बीजेपी ने उठाया फायदा

बीजेपी ने विपक्ष की कमजोरियों का फायदा उठाया। इस चुनाव में विपक्ष में स्पष्ट नेतृत्व और एक साझा स्ट्रैटेजी का अभाव नजर आया। इसमें ठाकरे बंधु अलग और कांग्रेस अलग चुनाव लड़ी। उनके साथ शरद पवार का गुट भी नहीं था। याद करिए जब लोकसभा चुनाव 2024 में उद्धव गुट, कांग्रेस और शरद पवार गुट एक साथ मिलकर चुनाव लड़े थे तो उन्होंने पूरे महाराष्ट्र में अच्छा प्रदर्शन किया था। लेकिन BMC और महाराष्ट्र की बाकी महानगरपालिकाओं के चुनाव में ऐसा होता नहीं दिखा।

सही मायने में देखा जाए तो अब मुंबई की सियासत पहचान नहीं ना होकर परफॉर्मेंस की तरफ बढ़ चुकी है। वोटर्स समझ गए हैं कि इमोशनल कोई मुद्दा नहीं सिर्फ विकास काम ही मुद्दा है।

यह भी पढ़ें: BMC चुनाव में उद्धव-राज की जोड़ी फ्लॉप, बीजेपी बनी सबसे बड़ी पार्टी

Sunil Gupta

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