BRICS India Challenges: नई दिल्ली में 12 सितंबर से ब्रिक्स शिखर सम्मेलन होने जा रहा है। ऐसे में सवाल और कायास लगाए जा रहे हैं कि शिखर सम्मेलन से भारत को क्या मिलेगा और उसके सामने कौन सी चुनौतियां आएंगी। आपको बता दें कि भारत के लिए यह शिखर सम्मेलन सिर्फ एक अंतरराष्ट्रीय बैठक नहीं है। यह भारत की कूटनीतिक ताकत, आर्थिक महत्वाकांक्षा और वैश्विक नेतृत्व क्षमता की बड़ी परीक्षा भी है। आइये जानते सभी बिंदुओं को क्रमवार।
भारत कर रहा इस शिखर सम्मेलन की अध्यक्षता
भारत इस समय BRICS की अध्यक्षता कर रहा है और इसी वजह से एजेंडा तय करने की जिम्मेदारी भी काफी हद तक भारत के पास है। भारत ने इस साल BRICS के लिए “Building for Resilience, Innovation, Cooperation and Sustainability” यानी लचीलेपन, नवाचार, सहयोग और टिकाऊ विकास को केंद्र में रखा है। ऐसे कुछ उपजते हैं जैसे इस सम्मेलन से भारत को मिलेगा क्या और भारत को खोना क्या पड़ सकता है?
भारत की कूटनीतिक ताकत बढ़ेगी?
BRICS अब सिर्फ पांच देशों का समूह नहीं है। इसका विस्तार हो चुका है और इसमें दुनिया की कई बड़ी उभरती अर्थव्यवस्थाएं शामिल हैं। ऐसे समय में जब दुनिया अमेरिका-चीन प्रतिद्वंद्विता, रूस-यूक्रेन युद्ध और बदलती वैश्विक आर्थिक व्यवस्था के बीच खड़ी है, भारत का BRICS की मेजबानी करना उसकी रणनीतिक अहमियत को बढ़ाता है। भारत यह संदेश देना चाहता है कि वह किसी एक खेमे का हिस्सा नहीं, बल्कि Global South की आवाज और वैश्विक शक्ति-संतुलन में स्वतंत्र भूमिका निभाने वाला देश है।
भारत को व्यापार और निवेश की उम्मीद
BRICS का सबसे बड़ा संभावित लाभ अर्थव्यवस्था में है। अगर भारत सदस्य देशों के साथ व्यापार, निवेश, ऊर्जा, डिजिटल तकनीक, स्टार्टअप, MSME और सप्लाई चेन के क्षेत्र में ठोस समझौते कर पाता है, तो भारतीय कंपनियों के लिए नए बाजार खुल सकते हैं। भारत की कोशिश यह होनी चाहिए कि BRICS सम्मेलन सिर्फ नेताओं की तस्वीरों तक सीमित न रहे, बल्कि निवेश, रोजगार और कारोबार के वास्तविक अवसर पैदा करे। ब्रिक्स के एजेंडे में व्यापार, तकनीक, ऊर्जा, स्वास्थ्य, कृषि, शहरी विकास और स्टार्टअप जैसे क्षेत्रों पर जोर दिया जा रहा है।
चीन के साथ संवाद का अवसर
यह सम्मेलन भारत और चीन के रिश्तों के लिहाज से भी महत्वपूर्ण है। अगर चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग दिल्ली आते हैं, जैसा कि उनकी संभावित यात्रा को लेकर रिपोर्टें सामने आई हैं, तो यह दोनों देशों के बीच संवाद का बड़ा अवसर बन सकता है। सीमा विवाद अपनी जगह है, लेकिन कूटनीति का मतलब यही है कि कठिन मुद्दों के बीच बातचीत के रास्ते खुले रहें। भारत के लिए चुनौती यह होगी कि चीन के साथ बातचीत हो, लेकिन राष्ट्रीय हित और सुरक्षा से कोई समझौता न हो।
अमेरिका और पश्चिम से रिश्तों का संतुलन भारत के लिए बड़ी चुनौती
BRICS को अगर अमेरिका और पश्चिमी देशों के खिलाफ एक राजनीतिक मोर्चे के रूप में पेश किया जाता है, तो भारत के लिए यह रणनीतिक नुकसान हो सकता है। भारत के अमेरिका और यूरोप के साथ भी महत्वपूर्ण आर्थिक, तकनीकी और रक्षा संबंध हैं। इसलिए नई दिल्ली के सामने सबसे बड़ी चुनौती है कि रूस और चीन के साथ BRICS में रहते हुए अमेरिका और पश्चिमी देशों के साथ अपने रिश्तों को संतुलित रखना।
BRICS के अंदर मतभेद
BRICS में सभी देशों के हित एक जैसे नहीं हैं। भारत और चीन के बीच सीमा और रणनीतिक प्रतिस्पर्धा है। रूस और पश्चिम के बीच गंभीर टकराव है। कई देशों की आर्थिक और विदेश नीति की प्राथमिकताएं अलग-अलग हैं। ऐसे में सवाल यह है कि क्या BRICS एक मजबूत आर्थिक मंच बनेगा या सिर्फ राजनीतिक घोषणाओं तक सीमित रहेगा? भारत की असली सफलता इसी बात से तय होगी।
क्या आम भारतीय को इसका फायदा मिलेगा?
सम्मेलन पर सुरक्षा और प्रशासनिक तैयारियों का बड़ा खर्च होगा। दिल्ली में यातायात पर भी असर पड़ रहा है और कई रास्तों पर डायवर्जन की व्यवस्था की जा रही है। लेकिन जनता यह जानना चाहेगी कि इन सबके बदले भारत को क्या मिला? अगर सम्मेलन के बाद नए निवेश आते हैं, निर्यात बढ़ता है, भारतीय कंपनियों को नए बाजार मिलते हैं, ऊर्जा सुरक्षा मजबूत होती है और रोजगार के अवसर पैदा होते हैं तभी इसका वास्तविक आर्थिक लाभ माना जाएगा।
राजनीतिक निष्कर्ष
इसलिए BRICS सम्मेलन को केवल मोदी सरकार की विदेश नीति की उपलब्धि कह देना भी अधूरा होगा और इसे केवल एक महंगा अंतरराष्ट्रीय आयोजन बताना भी गलत होगा। असल परीक्षा परिणाम की है। भारत के सामने मौका है कि वह BRICS को चीन या रूस के प्रभाव वाला मंच बनने से रोककर उसे व्यावहारिक आर्थिक सहयोग, तकनीक, विकास और Global South की आवाज का मंच बनाए।
BRICS से भारत को वास्तव में मिला क्या?
BRICS की मेज पर भारत की कुर्सी तो मजबूत है, अब देखना यह है कि उस कुर्सी से भारत दुनिया की राजनीति पर कितना असर डाल पाता है और देश की अर्थव्यवस्था के लिए कितना ठोस लाभ हासिल कर पाता है।”

