Cyclone Montha
Cyclone Montha : आंध्र प्रदेश से टकराने के बाद चक्रवाती तूफान ‘मोंथा’ अब ओडिशा की दिशा में आगे बढ़ चुका है। हालांकि, भारतीय मौसम विज्ञान विभाग (IMD) ने राहत की खबर दी है कि यह तूफान अब धीरे-धीरे कमजोर पड़ रहा है और इसकी तीव्रता अनुमानित स्तर से कम है। बावजूद इसके, इसका असर आंध्र प्रदेश और ओडिशा के कई इलाकों में व्यापक रूप से देखने को मिला है।
तूफान के चलते आंध्र प्रदेश में जनजीवन अस्त-व्यस्त हो गया है। कोनासीमा जिले में एक बुजुर्ग महिला की घर पर पेड़ गिरने से मौत हो गई, जबकि नारियल के पेड़ उखड़ने से एक युवक और एक ऑटो चालक घायल हुए हैं। कई जगहों पर तेज हवाओं और भारी बारिश ने सामान्य जीवन पर ब्रेक लगा दिया।
आईएमडी के अनुसार, मंगलवार शाम करीब 7 बजे ‘मोंथा’ तूफान ने आंध्र प्रदेश के काकीनाडा के पास तटीय इलाकों को पार किया। यह चक्रवात मछलीपट्टनम और कलिंगपट्टनम के बीच समुद्र तट से गुजरा। सबसे ज्यादा प्रभाव अल्लूरी सीताराम राजू, काकीनाडा, कृष्णा, एलुरु, पूर्वी और पश्चिमी गोदावरी, डॉ. बी.आर. अंबेडकर कोनासीमा, चिंतुरू और रामपचोदवरम जैसे जिलों में दर्ज किया गया है।
राज्य सरकार ने एहतियातन मंगलवार रात 8:30 बजे से बुधवार सुबह 6 बजे तक सात प्रभावित जिलों में वाहनों की आवाजाही पर रोक लगा दी थी। प्रशासन ने अनुमान जताया है कि चक्रवात राज्य के 403 मंडलों को प्रभावित कर सकता है।
आईएमडी ने किसानों को चेतावनी दी है कि यह तूफान धान और सब्जियों की फसलों को नुकसान पहुंचा सकता है। किसानों को सलाह दी गई है कि वे खेतों से पानी निकालने की व्यवस्था करें।
राज्य प्रशासन ने आपातकालीन स्थितियों से निपटने के लिए बड़े पैमाने पर इंतजाम किए हैं। 81 वायरलेस टावर और 21 बड़े लैंप लगाए गए हैं ताकि संचार बाधित न हो। 1,447 अर्थमूवर, 321 ड्रोन और 1,040 चेनसॉ मशीनें राहत कार्य के लिए तैयार रखी गई हैं। राज्यभर में 3.6 करोड़ अलर्ट मैसेज लोगों को भेजे गए हैं।
सुबह 8:30 बजे से शाम 4 बजे तक नेल्लोर जिले के उलवापाडु में 12.6 सेमी बारिश दर्ज की गई, जबकि कावली (12.2 सेमी), दगदर्थी (12 सेमी) और सिंगरायकोंडा (10.5 सेमी) में भी भारी वर्षा हुई।
मुख्यमंत्री एन. चंद्रबाबू नायडू की अध्यक्षता में हुई समीक्षा बैठक में अधिकारियों ने बताया कि नेल्लोर जिला इस बार सबसे ज्यादा प्रभावित हुआ है।
‘मोंथा’ शब्द थाई भाषा से लिया गया है, जिसका मतलब होता है “सुगंधित फूल”। यह नाम थाईलैंड की ओर से सुझाया गया है। साल 2004 से चक्रवातों के नामकरण की प्रक्रिया शुरू हुई थी ताकि इन प्राकृतिक आपदाओं की पहचान और जनजागरूकता आसान हो सके।
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भले ही ‘मोंथा’ अब कमजोर पड़ चुका है, लेकिन इसके चलते हुई भारी बारिश, पेड़ गिरने की घटनाओं और फसलों के नुकसान ने आंध्र प्रदेश और ओडिशा के लोगों को राहत से पहले चिंता में डाल दिया है।
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