Daisugi forestry technique: दुनिया में पेड़ों की कटाई का बड़ा कारण लकड़ी की मांग है, लेकिन जापान की करीब 14वीं सदी में विकसित Daisugi तकनीक बिना मूल पेड़ काटे लकड़ी उपलब्ध कराती है। क्योटो के पहाड़ी कितायामा क्षेत्र में सीमित जमीन और बढ़ती लकड़ी की मांग के बीच यह तरीका विकसित हुआ। यहां पारंपरिक चायघरों के लिए लंबे, सीधे देवदार के तनों की जरूरत थी।
कैसे काम करती है तकनीक?
Daisugi का अर्थ ‘प्लेटफॉर्म सीडर’ है। परिपक्व देवदार की शाखाओं की छंटाई कर ऊपरी हिस्से को सपाट रखा जाता है। वहां से सीधे नए तने उगते हैं, जिन्हें बांस और रस्सियों की मदद से लंबवत बढ़ाया जाता है। हर दो साल में अतिरिक्त शाखाएं हटाई जाती हैं। करीब 20 साल बाद तनों की कटाई होती है, जबकि मूल पेड़ जीवित रहता है और नए तने पैदा करता है।
सदियों तक मिलता है उत्पादन
एक पेड़ 200-300 वर्षों तक दर्जनों या सैकड़ों तने दे सकता है। Daisugi से मिलने वाली Taruki लकड़ी सामान्य देवदार से करीब 200% अधिक घनी और मजबूत तथा 140% अधिक लचीली बताई जाती है। हालांकि, यह तकनीक कुशल श्रम और वर्षों की देखभाल मांगती है और Kitayama cedar आधुनिक भार-वहन संरचनाओं के लिए आदर्श नहीं है।
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