ट्रंप का अल्टीमेटम या खामेनेई की चाल?
US Iran Ceasefire: दुनिया एक बड़े युद्ध के मुहाने पर खड़ी थी। खाड़ी क्षेत्र में तनाव चरम पर था और हर गुजरते मिनट के साथ खतरा बढ़ता जा रहा था। अमेरिका ने ईरान को साफ चेतावनी दे दी थी या तो स्ट्रेट ऑफ होर्मुज खोलो, या फिर विनाश के लिए तैयार रहो। डेडलाइन तय थी, दबाव चरम पर था, और पूरी दुनिया की निगाहें उसी एक पल पर टिकी थीं। लेकिन ठीक समयसीमा खत्म होने से करीब डेढ़ घंटे पहले अचानक सब कुछ बदल गया।
भारतीय समयानुसार सुबह करीब 4 बजे अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने सोशल मीडिया पर एक पोस्ट कर संघर्षविराम का ऐलान कर दिया। इसके कुछ ही देर बाद पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने भी पुष्टि की कि दोनों देशों के बीच जंग रोकने पर सहमति बन गई है। यह कोई साधारण समझौता नहीं था बल्कि आखिरी पलों में कई स्तरों पर चली गुप्त कूटनीति का नतीजा था।
विश्लेषकों के मुताबिक, इस संघर्षविराम में दोनों पक्ष अपनी-अपनी जीत का दावा कर सकते हैं। अमेरिका के लिए होर्मुज का खुलना सबसे बड़ी प्राथमिकता थी, क्योंकि इसके बंद होने से वैश्विक तेल आपूर्ति और कीमतों पर भारी असर पड़ रहा था। वहीं ईरान पर खार्ग द्वीप जैसे अहम तेल ठिकानों पर हमलों का खतरा मंडरा रहा था, जिससे उस पर भी दबाव बढ़ गया। आखिरकार, दोनों ने बीच का रास्ता चुना अमेरिका ने हमले की धमकी से कदम पीछे खींचे और ईरान ने होर्मुज खोलने पर सहमति दे दी।
इस पूरे घटनाक्रम में पाकिस्तान ने अहम भूमिका निभाई। सूत्रों के अनुसार पाकिस्तानी सेना और कूटनीतिक चैनलों ने अमेरिका और ईरान के बीच संदेश पहुंचाने का काम किया। अमेरिकी उपराष्ट्रपति जेडी वेंस और विशेष दूत स्टीव विटकॉफ के साथ ईरानी विदेश मंत्री अब्बास अराघची के बीच संपर्क बनाए रखा गया। इसके अलावा, चीन ने भी आखिरी समय में दखल देकर ईरान को नरम रुख अपनाने के लिए राजी किया।
14 दिनों का अस्थायी संघर्षविराम लागू होगा
ईरान स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को जहाजों के लिए खोलेगा
जहाजों पर शुल्क लगाने की अनुमति दी गई है जो पहले कभी नहीं हुआ
इन 14 दिनों में स्थायी समाधान और परमाणु मुद्दों पर बातचीत होगी
हालांकि, ईरान ने साफ किया है कि यह युद्ध का अंत नहीं, बल्कि सिर्फ एक विराम है।
ईरान की सर्वोच्च सुरक्षा परिषद ने संकेत दिया है कि जल्द ही इस्लामाबाद में अमेरिका के साथ बातचीत हो सकती है। लेकिन हालात अभी भी नाजुक हैं जरा सी चूक फिर से हालात बिगाड़ सकती है।
इजरायल के प्रधानमंत्री जामिन नेतन्याहू ने इस संघर्षविराम का समर्थन किया है, लेकिन साफ कर दिया है कि यह लेबनान में हिजबुल्ला के खिलाफ जारी सैन्य अभियान पर लागू नहीं होगा। कुल मिलाकर, यह संघर्षविराम किसी एक की जीत नहीं, बल्कि दबाव, रणनीति और कूटनीति का मिश्रण है। असली सवाल अब भी वही है क्या यह शांति स्थायी होगी या सिर्फ एक तूफान से पहले की खामोशी?
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