महिला आरक्षण के साथ परिसीमन का खेल!
Women Reservation Constitution Amendment Bill: देश की राजनीति आज एक ऐसे मोड़ पर खड़ी है, जहां से आगे का रास्ता आने वाले दशकों की सत्ता की दिशा तय कर सकता है। संसद के विस्तारित सत्र की शुरुआत के साथ ही केंद्र सरकार लोकसभा और राज्यों की विधानसभा सीटों में बड़े बदलाव की नींव रखने जा रही है। इसी के साथ महिला आरक्षण और परिसीमन जैसे दो बड़े मुद्दे एक साथ राष्ट्रीय बहस के केंद्र में आ गए हैं।
गुरुवार को लोकसभा में सरकार संविधान (131वां) संशोधन विधेयक-2026 पेश करेगी, जिसे इस पूरे बदलाव का आधार माना जा रहा है। इसी विधेयक के जरिए महिला आरक्षण को लागू करने का रास्ता भी तैयार किया जाएगा। इसके अलावा परिसीमन विधेयक-2026 और संघ शासित क्षेत्र कानून (संशोधन) विधेयक-2026 भी सदन के पटल पर रखे जाएंगे।
सरकार जहां इस प्रस्ताव को “समय की जरूरत” बता रही है, वहीं विपक्ष खासतौर पर कांग्रेस के नेतृत्व में परिसीमन को लेकर आक्रामक रुख अपना चुका है। महिला आरक्षण का खुला विरोध करना विपक्ष के लिए राजनीतिक रूप से मुश्किल है, लेकिन परिसीमन के मुद्दे पर पीछे हटने के कोई संकेत नहीं हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पहले ही महिला आरक्षण को राष्ट्रीय मुद्दा बना चुके हैं, ऐसे में यह बिल केवल संवैधानिक बदलाव नहीं बल्कि एक बड़ा राजनीतिक संदेश भी माना जा रहा है।
परिसीमन को लेकर सबसे ज्यादा चिंता दक्षिण भारतीय राज्यों में देखी जा रही है। इन राज्यों का तर्क है कि उन्होंने जनसंख्या नियंत्रण में बेहतर प्रदर्शन किया है, ऐसे में नई सीटों के बंटवारे में उनके साथ नुकसान हो सकता है। हालांकि सरकार ने इन आशंकाओं को सिरे से खारिज करते हुए साफ किया है कि-
किसी भी राज्य की सीटें कम नहीं होंगी
हर राज्य में लगभग 50% सीटों की बढ़ोतरी की जाएगी
लोकसभा की अधिकतम सीमा 850 सीट तय की गई है
यानी यह दावा किया जा रहा है कि यह “विस्तार” होगा, “कटौती” नहीं।
सरकार का कहना है कि आखिरी बार 1976 में लोकसभा सीटों में बदलाव हुआ था। इसके बाद जनसंख्या और क्षेत्रीय संतुलन में काफी बदलाव आ चुका है। इसलिए नई जनगणना (2011 के आंकड़ों) के आधार पर परिसीमन को जरूरी बताया जा रहा है। इसके लिए हर राज्य में एक परिसीमन आयोग गठित किया जाएगा, जो सभी राजनीतिक दलों से चर्चा के बाद सीटों का अंतिम खाका तैयार करेगा।
16 अप्रैल: लोकसभा में तीनों विधेयकों पर करीब 18 घंटे चर्चा
17 अप्रैल: मतदान के साथ लोकसभा में प्रक्रिया पूरी
18 अप्रैल: राज्यसभा में पेश, 10 घंटे बहस के बाद वोटिंग
यह पूरा घटनाक्रम सिर्फ विधायी प्रक्रिया नहीं, बल्कि 2026 के बाद की राजनीति का ब्लूप्रिंट माना जा रहा है। क्या यह कदम महिलाओं की भागीदारी बढ़ाने और प्रतिनिधित्व को संतुलित करने की दिशा में ऐतिहासिक बदलाव साबित होगा, या फिर यह सत्ता समीकरण को नए तरीके से गढ़ने की रणनीति है इसका जवाब आने वाले कुछ दिनों में साफ हो जाएगा।
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