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TMC में फूट, डीएमके गई रूठ… परिसीमन बिल को पास कराने की जुगाड़ कर रही BJP

Delimitation Politics India: देश की राजनीति में एक बार फिर परिसीमन (Delimitation) का मुद्दा चर्चा के केंद्र में है। लोकसभा और विधानसभा क्षेत्रों की सीमाओं के पुनर्निर्धारण से जुड़ा यह विषय केवल प्रशासनिक प्रक्रिया नहीं, बल्कि राजनीतिक शक्ति संतुलन को प्रभावित करने वाला बड़ा मुद्दा माना जाता है। इसी बीच विपक्षी दलों के भीतर उभरते मतभेदों ने इस बहस को और गर्म कर दिया है। एक तरफ तृणमूल कांग्रेस (TMC) के भीतर अलग-अलग सुर सुनाई दे रहे हैं, तो दूसरी ओर दक्षिण भारत की प्रमुख पार्टी DMK लगातार परिसीमन को लेकर अपनी आशंकाएं जता रही है। ऐसे माहौल में भारतीय जनता पार्टी (BJP) पर नजरें टिक गई हैं, जो भविष्य की राजनीतिक परिस्थितियों को देखते हुए अपनी रणनीति को मजबूत करने में जुटी दिखाई दे रही है।

आखिर क्या है परिसीमन

परिसीमन वह प्रक्रिया है जिसके तहत जनसंख्या के आधार पर लोकसभा और विधानसभा क्षेत्रों की सीमाओं को पुनः निर्धारित किया जाता है। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना होता है कि प्रत्येक निर्वाचन क्षेत्र में मतदाताओं का प्रतिनिधित्व संतुलित रहे। भारत में आखिरी बार बड़े स्तर पर परिसीमन 2008 में लागू हुआ था। हालांकि लोकसभा सीटों की कुल संख्या में बदलाव नहीं किया गया था। अब 2026 के बाद नई जनगणना के आधार पर परिसीमन की संभावना को लेकर राजनीतिक चर्चाएं तेज हैं।

दक्षिणी राज्यों की चिंता क्या है

दक्षिण भारत के कई राज्यों का मानना है कि उन्होंने जनसंख्या नियंत्रण के क्षेत्र में बेहतर प्रदर्शन किया है। यदि भविष्य में केवल जनसंख्या के आधार पर सीटों का पुनर्वितरण होता है तो उत्तर भारत के अधिक आबादी वाले राज्यों को ज्यादा सीटें मिल सकती हैं। यही वजह है कि तमिलनाडु की सत्तारूढ़ DMK लंबे समय से इस मुद्दे पर सवाल उठा रही है। पार्टी का तर्क है कि जनसंख्या नियंत्रण में सफल राज्यों को राजनीतिक रूप से नुकसान नहीं होना चाहिए। DMK का कहना है कि प्रतिनिधित्व तय करने के लिए केवल जनसंख्या ही नहीं, बल्कि विकास, प्रशासनिक क्षमता और क्षेत्रीय संतुलन जैसे पहलुओं पर भी विचार किया जाना चाहिए।

TMC में क्यों दिख रही है अलग राय

पश्चिम बंगाल की राजनीति में परिसीमन का मुद्दा उतना सीधा नहीं माना जाता। TMC के भीतर कुछ नेता इस विषय को राष्ट्रीय स्तर पर विपक्षी एकता से जोड़कर देख रहे हैं, जबकि कुछ का मानना है कि पार्टी को अपने राज्य के हितों को प्राथमिकता देनी चाहिए। राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि विपक्षी दलों के बीच इस मुद्दे पर एक जैसी राय नहीं बन पाना BJP के लिए अवसर पैदा कर सकता है। यदि विपक्ष एकजुट नहीं रहता, तो केंद्र सरकार के लिए भविष्य में ऐसे संवेदनशील मुद्दों पर राजनीतिक समर्थन जुटाना अपेक्षाकृत आसान हो सकता है।

BJP की रणनीति क्या हो सकती है

BJP आधिकारिक तौर पर परिसीमन को संवैधानिक और लोकतांत्रिक प्रक्रिया का हिस्सा बताती रही है। पार्टी का कहना है कि देश में जनसंख्या के बदलते स्वरूप के अनुसार प्रतिनिधित्व का पुनर्संतुलन आवश्यक है। राजनीतिक जानकारों के मुताबिक BJP इस मुद्दे को "एक व्यक्ति, एक वोट और समान प्रतिनिधित्व" के सिद्धांत से जोड़कर पेश कर सकती है। इसके जरिए वह उन राज्यों और क्षेत्रों का समर्थन हासिल करने की कोशिश कर सकती है जहां आबादी तेजी से बढ़ी है और लोगों को लगता है कि उन्हें पर्याप्त राजनीतिक प्रतिनिधित्व नहीं मिला।

संसद में क्या हो सकते हैं समीकरण

परिसीमन से जुड़े किसी भी बड़े बदलाव के लिए व्यापक राजनीतिक सहमति की जरूरत होगी। संसद में संख्याबल महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा, लेकिन उससे भी ज्यादा जरूरी होगा कि विभिन्न राज्यों की चिंताओं को संबोधित किया जाए। यदि BJP क्षेत्रीय दलों को विश्वास में लेने में सफल रहती है, तो भविष्य में परिसीमन से जुड़े प्रस्तावों के लिए समर्थन जुटाना उसके लिए आसान हो सकता है। वहीं यदि दक्षिणी राज्यों का विरोध मजबूत होता है तो यह केंद्र और राज्यों के बीच नए राजनीतिक विमर्श को जन्म दे सकता है।

2029 की राजनीति से भी जुड़ा है मामला

कई राजनीतिक विश्लेषक परिसीमन की बहस को 2029 के लोकसभा चुनावों की तैयारियों से जोड़कर भी देख रहे हैं। उनका मानना है कि लोकसभा सीटों के संभावित पुनर्वितरण से राष्ट्रीय राजनीति का समीकरण बदल सकता है। कुछ राज्यों का प्रभाव बढ़ सकता है, जबकि कुछ राज्यों की राजनीतिक हिस्सेदारी अपेक्षाकृत कम हो सकती है। इसलिए लगभग सभी बड़े दल इस मुद्दे को बेहद गंभीरता से देख रहे हैं।

परिसीमन का मुद्दा आने वाले वर्षों में भारतीय राजनीति की सबसे बड़ी बहसों में से एक बन सकता है। TMC के भीतर उभरते मतभेद, DMK की नाराजगी और BJP की सक्रिय रणनीति इस बात का संकेत हैं कि राजनीतिक दल अभी से अपने-अपने समीकरण साधने में जुट गए हैं। फिलहाल यह स्पष्ट है कि परिसीमन केवल सीटों के पुनर्वितरण का विषय नहीं, बल्कि देश के संघीय ढांचे, क्षेत्रीय प्रतिनिधित्व और भविष्य की राजनीति से जुड़ा एक महत्वपूर्ण प्रश्न बन चुका है। आने वाले समय में इस मुद्दे पर होने वाली राजनीतिक गतिविधियां राष्ट्रीय राजनीति की दिशा तय करने में बड़ी भूमिका निभा सकती हैं।

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Lavanya Dayal

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