Dharmendra Pradhan Resignation: दिल्ली के जंतर मंतर पर सीजेपी के बैनर तले छात्रों के प्रदर्शन ने एनडीए सरकार को झुकाते हुए केंद्रीय मंत्री धर्मेंद्र प्रधान को इस्तीफा देने के लिए मजबूर कर दिया। बीते 35 दिनों के प्रदर्शन में सोनम वांगचुक की भूख हड़ताल, पुलिस लाठीचार्ज के वायरल वीडियो, राहुल गांधी का पीएम आवास के बाहर धरना, विपक्षी एकता, विदेशों में भारतीय छात्रों के प्रदर्शन, सेलिब्रिटीज का समर्थन और BJP के अंदर से उठती आवाजों ने सरकार को घेर लिया। 2027 के राज्य चुनावों और 2029 के लोकसभा चुनाव में युवा वोट बैंक खोने का खतरा भी साफ था। आइये जानते वो बड़े 7 कारण जिसने धर्मेंद्र प्रधान को इस्तीफा देने के लिए बाध्य किया।
छात्रों पर पुलिस का बर्बरतापूर्ण एक्शन
18 जुलाई को सोनम वांगचुक को सफेद चादर में लपेटकर उठाने और 20 जुलाई को संसद मार्च पर लाठीचार्ज का वीडियो वायरल होने से देशव्यापी आक्रोश फैला। न्यूयॉर्क टाइम्स समेत अंतरराष्ट्रीय मीडिया ने कवरेज किया, जिससे सरकार की छवि बुरी तरह प्रभावित हुई और आंदोलन को नया मोड़ मिला।
राहुल गांधी का अचानक धरना और विपक्षी एकता
21 जुलाई को राहुल गांधी, प्रियंका और अखिलेश यादव समेत विपक्षी नेताओं का पीएम आवास के बाहर धरना सरकार को चौंका गया। राहुल ने इस्तीफे और माफी की अटल मांग की, संसद ठप कर दी और विपक्ष पूरी तरह एकजुट हो गया।
विदेशों में भारतीय छात्रों का प्रदर्शन
ब्रिटेन, अमेरिका, कनाडा, जर्मनी आदि में पढ़ रहे छात्रों ने लंदन स्थित भारतीय उच्चायोग के बाहर प्रदर्शन किए और धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग की। इससे मुद्दा अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चला गया।
युवाओं का व्यापक समर्थन और भीड़ का बढ़ना
जंतर-मंतर पर 20-30 हजार युवाओं की निरंतर मौजूदगी और पुलिस कार्रवाई के बाद भीड़ में और इजाफा हुआ। 35 दिनों के अनशन ने युवाओं में सरकार के खिलाफ गुस्सा भरा, जो बड़े आंदोलन का रूप ले सकता था।
BJP के अंदर से असंतोष और आवाजें
मुरली मनोहर जोशी जैसे वरिष्ठ नेता ने छात्रों पर बर्बर व्यवहार की निंदा की। बीजेपी सांसदों ने मिस-मैनेजमेंट पर नाराजगी जताई, जिससे पार्टी आंतरिक दबाव में आ गई। वहीं, आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत का नई पीढ़ी को स्नेह और संवाद का आह्वान अप्रत्यक्ष रूप से प्रदर्शन की गंभीरता को रेखांकित करता था, जिसने सरकार पर नैतिक दबाव बढ़ाया।
आगामी चुनावी नुकसान का खतरा
उत्तर प्रदेश, पंजाब और उत्तराखंड में 2027 के चुनावों को देखते हुए पेपर लीक मुद्दा युवाओं के बीच BJP के खिलाफ बड़ा हथियार बन सकता था। इन राज्यों के युवा दिल्ली में बड़ी संख्या में थे। वहीं आगामी लोकसभा चुनाव का दीर्घकालिक खतरे को भी सरकार ने भापा है। इस आंदोलन की तुलना 1974 के जेपी आंदोलन और 2011 के अन्ना आंदोलन से होने लगी थी। दोनों बार सत्ता बदली थी। कांग्रेस इसे भुनाकर 2029 में BJP को सत्ता से बेदखल कर सकती थी।
पेपर लीक को गंभीर राष्ट्रीय मुद्दा बनना
क्रिकेटरों, बॉलीवुड, साउथ स्टार्स और इंफ्लुएंसर्स के समर्थन से मुद्दा शिक्षा और बेरोजगारी से जुड़ गया। VoteVibe सर्वे में 41.4% लोगों ने BJP-NDA को नुकसान की आशंका जताई। CJP प्रवक्ता ने आंदोलन को पार्टी से बाहर बताते हुए देशव्यापी धमकी दी। सोनम के अस्पताल जाने के बाद भी आंदोलन नहीं थमा, बल्कि और फैला। लंबा खिंचने पर सरकार को भारी राजनीतिक और चुनावी क्षति का डर था।

