Do you know the story of the 'bloody village' of Uttarakhand (1)
Uttarakhand Khuni Village : उत्तराखंड के पिथौरागढ़ जिले का एक गांव लंबे समय से अपने अजीब और डरावने नाम “खूनी गांव” के कारण चर्चा में रहा है। इस नाम ने गांव की पहचान को हमेशा एक खौफनाक रूप में पेश किया। यह नाम जितना अजीब था, उतना ही डरावना भी। इस नाम ने न केवल गांव की पहचान को नकारात्मक रूप से प्रभावित किया, बल्कि यहां के ग्रामीणों के लिए यह मानसिक बोझ भी बन गया था। बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक, सभी इस नाम को लेकर असहज महसूस करते थे। किसी को अपना गांव बताते समय शर्मिंदगी होती थी, तो किसी को लगता था कि इस नाम से गांव हमेशा डर और खौफ से जुड़ा रहेगा।
आपको बता दें कि ग्रामीणों की वर्षों से यही इच्छा रही कि गांव का नाम बदला जाए और उसे एक सकारात्मक पहचान दी जाए। इस मांग को गंभीरता से आगे बढ़ाया ओएनजीसी के पूर्व महाप्रबंधक ललित मोहन जोशी ने। उन्होंने ग्रामीणों के साथ मिलकर गांव के नाम बदलने की आवाज को उठाया और सांसद अजय टम्टा व मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी तक यह मुद्दा पहुंचाया। आखिरकार, वर्षों की कोशिशों के बाद 18 अगस्त को उत्तराखंड सरकार ने गृह मंत्रालय की सहमति मिलने के बाद अधिसूचना जारी कर दी और खूनी गांव का नाम बदलकर “देवीग्राम” रख दिया गया।
अब सवाल उठता है कि आखिर इस गांव का नाम “खूनी गांव” क्यों पड़ा था? इस नाम के पीछे कई कहानियां प्रचलित हैं। ग्रामीणों के अनुसार, ब्रिटिश काल के दौरान जब अंग्रेज इस क्षेत्र में आए, तो उन्होंने स्थानीय लोगों पर अत्याचार करना शुरू कर दिया। लेकिन गांव के लोगों ने अत्याचार सहने के बजाय अंग्रेजों का बहादुरी से मुकाबला किया। इस संघर्ष में काफी खून बहा और उसी से इस जगह को “खूनी गांव” कहा जाने लगा। वहीं कुछ बुजुर्ग बताते हैं कि बहुत समय पहले यहां कई अप्रिय और अलौकिक घटनाएं भी हुईं, जिससे इस गांव की पहचान और भी डरावनी बन गई।
जानकारी के लिए आपको बता दें कि गांव की आबादी करीब 380 है और यहां लगभग 60 परिवार रहते हैं। इतने छोटे से गांव के लोगों के लिए यह नाम किसी अभिशाप से कम नहीं था। खासकर युवाओं को आगे बढ़ने और पढ़ाई-नौकरी के लिए बाहर जाना पड़ता था, तब उन्हें अपने गांव का नाम बताते समय असहजता होती थी। कई बार मजाक का शिकार भी होना पड़ता था। इसीलिए नाम बदलना उनके लिए सम्मान और आत्मसम्मान से जुड़ा हुआ मुद्दा था। “देवीग्राम” नाम रखने से ग्रामीणों को नई पहचान मिली है। यह नाम न केवल धार्मिक आस्था से जुड़ा है बल्कि सकारात्मकता और शांति का प्रतीक भी है। इससे गांव की छवि में बड़ा बदलाव आएगा। अब जब कोई इस गांव के बारे में सुनेगा तो डरावनी छवि के बजाय एक पवित्र और सम्मानजनक नाम उनके सामने होगा।
कहा जा सकता है कि यह सिर्फ नाम बदलने की घटना नहीं है, बल्कि यह ग्रामीणों की वर्षों की जद्दोजहद, आत्मसम्मान की लड़ाई और बेहतर भविष्य की चाह का परिणाम है। “खूनी गांव” अब “देवीग्राम” बन चुका है, और इस बदलाव ने ग्रामीणों के जीवन में गर्व और उम्मीद की नई किरण जगा दी है। आने वाली पीढ़ियों को अब एक ऐसी पहचान मिली है, जिस पर वे फख्र कर सकें।
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