El Nino and Indian Ocean Dipole: दुनिया भर के मौसम वैज्ञानिक एक बार फिर प्रशांत महासागर में बनने वाली अल-नीनो (El Niño) स्थिति पर नजर बनाए हुए हैं। जलवायु विशेषज्ञों का मानना है कि यदि आने वाले महीनों में अल-नीनो प्रभाव मजबूत होता है तो इसका असर वैश्विक तापमान, वर्षा चक्र, कृषि उत्पादन और जल संसाधनों पर पड़ सकता है। अल-नीनो को अक्सर मौसम का "महादानव" कहा जाता है क्योंकि यह दुनिया के कई हिस्सों में सूखा, असामान्य गर्मी, जंगलों में आग और बारिश के पैटर्न में बड़े बदलाव का कारण बन सकता है। हालांकि इस बार वैज्ञानिकों को उम्मीद है कि भारतीय महासागर में विकसित होने वाली एक विशेष जलवायु स्थिति, जिसे कई विशेषज्ञ अनौपचारिक रूप से "इंडियन अल-नीनो" कहते हैं, अल-नीनो के प्रभाव को कुछ हद तक संतुलित कर सकती है।
आखिर क्या होता है अल-नीनो
अल-नीनो एक प्राकृतिक जलवायु घटना है, जो प्रशांत महासागर के मध्य और पूर्वी हिस्से के समुद्री जल के सामान्य से अधिक गर्म होने पर विकसित होती है। इस प्रक्रिया के कारण वैश्विक वायुमंडलीय और समुद्री परिसंचरण प्रभावित होता है। इसका असर केवल समुद्र तक सीमित नहीं रहता, बल्कि दुनिया के कई देशों में मौसम के स्वरूप को बदल देता है। भारत समेत दक्षिण एशिया के देशों में अल-नीनो का संबंध अक्सर कमजोर मानसून और कम वर्षा से जोड़ा जाता है।
भारत के लिए क्यों महत्वपूर्ण है यह घटना
भारत की अर्थव्यवस्था और कृषि काफी हद तक मानसून पर निर्भर है। देश के करोड़ों किसान वर्षा आधारित खेती करते हैं। ऐसे में यदि अल-नीनो के कारण मानसून कमजोर पड़ता है तो कृषि उत्पादन, जल भंडारण और ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर प्रभाव पड़ सकता है। इतिहास बताता है कि कई वर्षों में मजबूत अल-नीनो की स्थिति के दौरान भारत में सामान्य से कम बारिश दर्ज की गई थी। हालांकि हर बार ऐसा हो, यह जरूरी नहीं है क्योंकि मानसून को प्रभावित करने वाले कई अन्य कारक भी मौजूद रहते हैं।
क्या है ‘इंडियन अल-नीनो’
वैज्ञानिक भाषा में इसे आमतौर पर इंडियन ओशन डाइपोल (IOD) कहा जाता है। यह भारतीय महासागर में समुद्री सतह के तापमान में होने वाले अंतर से जुड़ी एक जलवायु घटना है। जब पश्चिमी भारतीय महासागर का तापमान पूर्वी हिस्से की तुलना में अधिक गर्म हो जाता है, तब सकारात्मक IOD की स्थिति बनती है। कई शोधों में पाया गया है कि सकारात्मक IOD भारत में मानसून को मजबूत करने में मदद कर सकता है और कुछ मामलों में अल-नीनो के नकारात्मक प्रभाव को कम करने की क्षमता रखता है।
जलवायु परिवर्तन ने बढ़ाई चुनौती
विशेषज्ञों का कहना है कि जलवायु परिवर्तन के कारण मौसम संबंधी घटनाएं पहले की तुलना में अधिक जटिल होती जा रही हैं। बढ़ते वैश्विक तापमान ने समुद्री सतह के तापमान को भी प्रभावित किया है। इसके चलते अल-नीनो, ला-नीना और इंडियन ओशन डाइपोल जैसी घटनाओं के प्रभाव और तीव्रता में बदलाव देखने को मिल सकता है। यही वजह है कि मौसम का पूर्वानुमान लगाना अब पहले से अधिक चुनौतीपूर्ण हो गया है।
किसानों और नीति निर्माताओं की बढ़ी निगाहें
अल-नीनो और IOD की स्थिति पर केवल वैज्ञानिक ही नहीं, बल्कि किसान, जल संसाधन प्रबंधन से जुड़े विभाग और नीति निर्माता भी नजर बनाए हुए हैं। मानसून की स्थिति का सीधा असर खाद्यान्न उत्पादन, जलाशयों के स्तर और बिजली उत्पादन पर पड़ता है। ऐसे में मौसम से जुड़ा हर संकेत महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
आने वाले महीनों में साफ होगी तस्वीर
मौसम वैज्ञानिकों का कहना है कि आने वाले हफ्तों और महीनों में समुद्री तापमान तथा वायुमंडलीय परिस्थितियों के आधार पर यह अधिक स्पष्ट हो पाएगा कि अल-नीनो कितना प्रभावी होगा और इंडियन ओशन डाइपोल उसकी भरपाई किस हद तक कर सकेगा। फिलहाल सभी एजेंसियां स्थिति पर लगातार निगरानी रख रही हैं और समय-समय पर अपने पूर्वानुमान अपडेट कर रही हैं।
अल-नीनो को दुनिया की सबसे प्रभावशाली जलवायु घटनाओं में से एक माना जाता है और इसका असर भारत सहित कई देशों के मौसम पर पड़ सकता है। हालांकि इस बार भारतीय महासागर में बनने वाली सकारात्मक परिस्थितियां राहत की उम्मीद जगा रही हैं। यदि इंडियन ओशन डाइपोल अनुकूल बना रहता है, तो यह भारत के मानसून को सहारा दे सकता है और अल-नीनो के संभावित नकारात्मक प्रभावों को कुछ हद तक कम कर सकता है। फिलहाल मौसम वैज्ञानिकों की नजर समुद्र और आसमान दोनों पर टिकी हुई है, क्योंकि आने वाले महीनों में मानसून और मौसम की दिशा तय होने वाली है।
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