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डोनाल्ड ट्रंप के दबाव के आगे झुक रहा भारत,रूस से तेल की खरीदारी काफ़ी कम हुई

अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप लगातार दबाव के बाद भारत रूस से कच्चे तेल की आयत में कमी कर सकते हैं SCMP की रिपोर्ट के अनुसार| अगर ऐसा हुआ तो भारत और अन्य देशों से तेल आयात करते हुए विचार कर सकते हैं लेकिन उन देशों  पर अमेरिका के प्रतिबद्ध इसे चुनौतीपूर्ण बन सकता है 

विशेषज्ञों का क्या मानना है

विशेषज्ञों का मानना है कि “भारतीय लोग व्यावहारिक हैं और मुझे लगता है कि वे पहले ही रूस के तेल पर निर्भरता कम कर रहे हैं,” ग्रियर ने न्यूयॉर्क के इकॉनॉमिक क्लब में कहा, जहां उन्होंने ट्रंप प्रशासन की नीतियों और चीन, मेक्सिको और कनाडा के साथ संबंधों के पुनर्मूल्यांकन पर बात की।

राष्ट्रपति पुतिन ने दी भारत को चेतावनी

दूसरी ओर, रूस के राष्ट्रपति  पुतिन ने चेतावनी दी है कि अगर भारत रूस से व्यापार रोकता है, तो उसे नुकसान होगा। उन्होंने कहा, “अगर भारत हमारे ऊर्जा आपूर्ति को ठुकराता है, तो उसे निश्चित नुकसान होगा… भारत के लोग, विश्वास कीजिए, राजनीतिक नेतृत्व के फैसलों पर नजर रखेंगे और किसी के सामने अपमान कभी बर्दाश्त नहीं करेंगे।”

140 अरब डॉलर के तेल की खरीदी

जानकारी के अनुसार, पिछले कुछ वर्षों में भारत ने रूस से करीब 140 अरब डॉलर का तेल खरीदा है, जिससे वह चीन के बाद दूसरा सबसे बड़ा खरीदार बन गया है। भारत का कहना है कि उसने अमेरिका के दबाव में ईरान से तेल का आयात बंद किया था। वहीं, ट्रंप लगातार आरोप लगाते रहे हैं कि भारत के तेल आयात की वजह से यूक्रेन में युद्ध लंबित है।

भारत को चुकानी पड़ेगी राजनीतिक कीमत

पुतिन ने कहा कि रूसी तेल वाहकों को अस्वीकार करने की घरेलू राजनीतिक क़ीमत चुकानी पड़ेगी। भारतीय लोग कभी भी किसी के द्वारा अपमानित नहीं होने देंगे। मैं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को जानता हूँ, वह भी ऐसा कोई फ़ैसला नहीं लेंगे।” पुतिन ने दक्षिण रूस में अंतर्राष्ट्रीय वल्दाई चर्चा मंच पर कहा।

कैसे हैं भारत और रूस के संबंध

पुतिन ने भारत-रूस संबंधों के महत्व पर भी ज़ोर दिया और कहा: “मेरा मानना ​​है कि भारत के लोग इसे और हमारे संबंधों को नहीं भूलते। लगभग 15 साल पहले, हमने एक विशेषाधिकार प्राप्त रणनीतिक साझेदारी की घोषणा की थी, और यही सबसे अच्छा वर्णन है। प्रधानमंत्री मोदी एक बहुत ही बुद्धिमान नेता हैं जो सबसे पहले अपने देश के बारे में सोचते हैं।”

विशेषज्ञों का मानना है कि वैश्विक भू-राजनीति और ऊर्जा बाजार में लगातार बदलाव हो रहे हैं, इसलिए भविष्य में भारत की तेल नीति किस दिशा में जाएगी, कहना मुश्किल है।

Anil

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