Jagannath Ganpati Form: ओडिशा के पुरी स्थित जगन्नाथ धाम में ज्येष्ठ पूर्णिमा के दिन महास्नान पूर्णिमा का पर्व अत्यंत श्रद्धा और भक्ति के साथ मनाया जाता है। इस दिन भगवान जगन्नाथ, भगवान बलभद्र और देवी सुभद्रा का विशेष स्नान कराया जाता है। यह आयोजन रथ यात्रा से पहले होने वाले सबसे महत्वपूर्ण धार्मिक अनुष्ठानों में से एक माना जाता है। हजारों श्रद्धालु इस अवसर पर भगवान के दर्शन के लिए पुरी पहुंचते हैं और इस दिव्य परंपरा के साक्षी बनते हैं।
108 कलशों से होता है महास्नान
महास्नान पूर्णिमा के दिन भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा को मंदिर परिसर में स्थित स्नान मंडप पर लाया जाता है। यहां पवित्र जल से भरे 108 कलशों से उनका अभिषेक किया जाता है। मान्यता है कि इस पवित्र स्नान से भगवान अपने भक्तों को सुख, समृद्धि और कल्याण का आशीर्वाद प्रदान करते हैं। यह अनुष्ठान जगन्नाथ संस्कृति की सबसे महत्वपूर्ण परंपराओं में से एक है।
महास्नान के बाद क्यों धारण करते हैं गणपति स्वरूप
स्नान के बाद भगवान जगन्नाथ का एक विशेष श्रृंगार किया जाता है, जिसे 'हाथी वेश' या 'गजानन वेश' कहा जाता है। इस वेश में भगवान का स्वरूप भगवान गणेश के समान दिखाई देता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, एक भक्त की इच्छा पूरी करने के लिए भगवान ने गणेश स्वरूप धारण किया था। तभी से यह परंपरा चली आ रही है और हर वर्ष महास्नान के बाद भगवान को गजानन वेश में सजाया जाता है।
हाथी वेश का क्या है महत्व
हाथी वेश भगवान गणेश की बुद्धि, शुभता और विघ्नों को दूर करने की शक्ति का प्रतीक माना जाता है। इस दिन भगवान जगन्नाथ को गणपति स्वरूप में देखने के लिए बड़ी संख्या में श्रद्धालु मंदिर पहुंचते हैं। यह परंपरा भगवान जगन्नाथ और भगवान गणेश के प्रति श्रद्धा और समन्वय का सुंदर उदाहरण भी मानी जाती है।
स्नान के बाद भगवान क्यों रहते हैं विश्राम पर
मान्यता है कि 108 कलशों से स्नान के बाद भगवान अस्वस्थ हो जाते हैं। इसके बाद उन्हें 15 दिनों तक विश्राम कराया जाता है। इस अवधि को अनसर काल कहा जाता है। इस दौरान मंदिर के गर्भगृह में भगवान के दर्शन बंद रहते हैं। मान्यता है कि वैद्य भगवान का उपचार करते हैं और इसके बाद भगवान नवयौवन रूप में भक्तों को दर्शन देते हैं।
रथ यात्रा से जुड़ा है विशेष संबंध
महास्नान पूर्णिमा के बाद शुरू होने वाला अनसर काल समाप्त होने पर भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा रथ यात्रा के लिए तैयार होते हैं। यही कारण है कि यह पर्व रथ यात्रा की तैयारियों का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाता है। श्रद्धालु इस पूरे धार्मिक क्रम को भगवान के जीवन से जुड़े दिव्य उत्सव के रूप में देखते हैं।
देश-विदेश से पहुंचते हैं श्रद्धालु
महास्नान पूर्णिमा और हाथी वेश के दर्शन के लिए देश ही नहीं बल्कि विदेशों से भी बड़ी संख्या में श्रद्धालु पुरी पहुंचते हैं। मंदिर परिसर में विशेष व्यवस्थाएं की जाती हैं और सुरक्षा के व्यापक इंतजाम किए जाते हैं। यह परंपरा ओडिशा की धार्मिक और सांस्कृतिक विरासत का महत्वपूर्ण हिस्सा मानी जाती है।
महास्नान पूर्णिमा के बाद भगवान जगन्नाथ का गणपति स्वरूप धारण करना पुरी की सबसे अनोखी और प्राचीन परंपराओं में से एक है। यह परंपरा आस्था, भक्ति और भारतीय संस्कृति की विविधता को दर्शाती है। हाथी वेश के दर्शन श्रद्धालुओं के लिए अत्यंत शुभ और पवित्र माने जाते हैं।
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