उत्तर प्रदेश

जानिए क्या है वाराणसी ‘रामनगर की रामलीला’ की वो ख़ासियत, जिसने इसे UNESCO की विश्व धरोहरों में दिलाई जगह

Ramlila of Ramnagar: वाराणसी के रामनगर की रामलीला अपनी शाही ठाठ-बाट और अनोखी विशेषताओं के लिए मशहूर है। यह लीला न सिर्फ अपनी भव्यता के कारण खास है, बल्कि इसे देखने वाले दर्शक भी उतने ही विशिष्ट हैं। इस शाही रामलीला का नाता केवल काशी नरेश से ही नहीं, बल्कि जौहरी परिवार से भी कई पीढ़ियों तक जुड़ा हुआ है। जौहरी परिवार की चार पीढ़ियां इस लीला को निरंतर देखने और आनंद लेने का काम करती आ रही हैं।

242 साल पुराना है रामलीला का इतिहास

वाराणसी की इस रामलीला का इतिहास 242 साल पुराना है। आधुनिक समय के बावजूद, यह लीला आज भी वैसी ही प्रस्तुत होती है जैसी दो सदी पहले होती थी। इसे देखने के लिए हर दिन खुद काशी नरेश हाथी पर सवार होकर समारोह में शामिल होते हैं।

पेट्रोमेक्स की रोशनी में आयोजित

1783 में तत्कालीन काशी नरेश उदित नारायण सिंह ने इस रामलीला की शुरुआत की थी। यह लीला पेट्रोमेक्स की रोशनी में आयोजित होती है, जिसके लिए विशेष कारीगर यहां आते हैं। इस रामलीला के लिए कोई स्थायी मंच नहीं होता; हर दिन लीला का मंचन अलग-अलग स्थानों पर किया जाता है।

UNESCO के विश्व धरोहरों की सूची में भी शामिल

रामलीला ने धीरे-धीरे विश्वप्रसिद्धि के शिखर तक का सफर तय किया और आज यह यूनेस्को की विश्व धरोहरों की सूची में शामिल होने का गौरव भी हासिल कर चुकी है।

साहित्य और शोधन कार्य

महाराज ईश्वरी नारायण सिंह के समय रामलीला के संवाद, मंच और स्थलों का वैज्ञानिक और व्यवस्थित शोधन किया गया। इसमें प्रमुख योगदान हिंदी साहित्यकार भारतेंदु हरिश्चंद्र, रीवा नरेश रघुराज सिंह और संत काष्ठ जिह्वा स्वामी ने दिया।

मंच और स्थल

रामलीला लगभग 10 वर्ग किलोमीटर के क्षेत्र में विभिन्न स्थलों जैसे अयोध्या, जनकपुर, पंचवटी, लंका, चित्रकूट, निषादराज आश्रम आदि में आयोजित होती है। प्रत्येक प्रसंग के अनुसार मंचन होता है और कोई स्थायी मंच नहीं होता।

तैयारी और परंपरा

रामलीला की औपचारिक शुरुआत भाद्रपद मास की अनंत चतुर्दशी से होती है, लेकिन पात्रों का चयन, प्रशिक्षण, उपकरणों की तैयारी और पूजन कई महीनों पहले से शुरू हो जाता है।

अभिनय और संगीत

रामचरित मानस के अनुसार संवाद और प्रसंग मंचित होते हैं। रामायणी दल प्रसंगानुसार गायन करता है और इसके बाद संवाद अदायगी के साथ प्रस्तुत किया जाता है।

दर्शक और नेमीजन

रामलीला में दर्शक केवल देखने वाले नहीं, बल्कि प्रसंग के अनुसार भागीदारी निभाते हैं। नेमी और साधु-संतों की पीढ़ी-दर-पीढ़ी श्रद्धा और समर्पण इस लीला की अनोखी विशेषता है।

विशेषता और विश्व प्रसिद्धि

रामनगर की रामलीला बिना आधुनिक ध्वनि या लाइट सिस्टम के भी हजारों दर्शकों को अनुशासित और प्रभावित करती है। इसकी भव्यता, सहजता और सौम्य श्रेष्ठता इसे विश्वप्रसिद्ध बनाती है।

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Kajal Sharma

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