Loneliness Epidemic in India: भारत में करीब 75 करोड़ इंटरनेट यूजर्स हैं। देश दुनिया की सबसे ज्यादा कनेक्टेड और सबसे युवा बड़ी आबादी में शामिल है। इसके बावजूद विडंबना यह है कि जो लोग इंटरनेट का सबसे ज्यादा इस्तेमाल करते हैं, उन्हीं के बीच अकेलेपन की समस्या तेजी से बढ़ रही है। विशेषज्ञ इसे तेजी से उभरती 'Loneliness Epidemic' मान रहे हैं।
आंकड़े क्या कहते हैं?
करीब 43% शहरी भारतीय कभी-कभार अकेलापन महसूस करते हैं, जबकि हर 6 में से 1 व्यक्ति नियमित रूप से अकेलेपन का अनुभव करता है। भारत के Longitudinal Aging Study के अनुसार, 45 वर्ष और उससे अधिक उम्र के लोगों में 35 राज्यों से जुड़े 72,000 लोगों के आंकड़ों में 20.5% ने मध्यम स्तर के अकेलेपन और 13% ने गंभीर अकेलेपन की जानकारी दी।
अकेलापन क्यों बढ़ रहा है?
जड़ों से दूर होता पलायन: हर साल लाखों लोग रोजगार के लिए दूसरे शहरों में जाते हैं। वे छोटे किराए के कमरों में अकेले या अनजान लोगों के साथ रहते हैं। मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ और The Full Circle की संस्थापक नूपुर मोहन के मुताबिक, ऐसे पलायन में पड़ोसियों, रिश्तेदारों और पुराने दोस्तों से मिलने वाला जुड़ाव पीछे छूट जाता है।
दिखावटी डिजिटल कनेक्शन: ऑनलाइन सक्रिय रहना और वास्तव में किसी से जुड़ा महसूस करना अलग बातें हैं। लोग लगातार पोस्ट, मैसेज और प्रतिक्रियाओं में व्यस्त हैं, लेकिन फिर भी अपने सामाजिक दायरे में खुद को अनदेखा महसूस करते हैं। ऑनलाइन दिखना आसान है, लेकिन गहरी आत्मीयता बनाना मुश्किल।
सामाजिक चुप्पी: भारत में खासकर पुरुष अकेलेपन को स्वीकार करने से बचते हैं, क्योंकि उनसे आत्मनिर्भर रहने की उम्मीद की जाती है। इस भावना को लेकर सामाजिक स्वीकार्यता भी कम है। नूपुर के अनुसार, अकेलापन खतरनाक इसलिए है क्योंकि लोग इसके बारे में खुलकर बात नहीं करते। नतीजतन, ब्रांड और नियोक्ता उन समस्याओं के समाधान पर ध्यान नहीं दे पाते, जिन्हें वे देख ही नहीं पाते।
स्वास्थ्य पर गंभीर असर
लंबे समय तक रहने वाला अकेलापन डिप्रेशन, एंग्जायटी, नींद की समस्या और हृदय रोग का जोखिम बढ़ा सकता है और प्रतिरक्षा प्रणाली को कमजोर कर सकता है। बुजुर्गों में डिप्रेशन से अकेलेपन की संभावना 6.5 गुना और विकलांगता का जोखिम भी 6.5 गुना अधिक बताया गया है।
जुड़ाव मजबूत करने के 5 तरीके
- अकेलेपन को शब्द दें: जब अकेलापन महसूस हो तो किसी भरोसेमंद व्यक्ति से बात करें। इससे मस्तिष्क में भावनात्मक नियंत्रण और जुड़ाव की प्रक्रिया सक्रिय होती है।
- लिसनिंग सर्विस का सहारा लें: ऐसी सेवाओं में प्रशिक्षित या संवेदनशील श्रोता बिना सलाह दिए आपकी बात सुनते हैं। थेरेपी से पहले यह मददगार हो सकता है।
- 'थर्ड प्लेसेज' बनाएं: घर और ऑफिस के अलावा ऐसे भौतिक स्थान जरूरी हैं जहां लोग जुड़ सकें। 78% Gen Z कर्मचारी ऐसे कार्यस्थल पसंद करते हैं जो सामाजिक जुड़ाव को बढ़ावा दें और कनेक्शन न मिलने पर नौकरी छोड़ने पर भी विचार कर सकते हैं।
- अपना डिजिटल डाइट जांचें: अगर कोई प्लेटफॉर्म जुड़ाव के बजाय तुलना और असुरक्षा बढ़ाता है, तो वह समस्या को कम करने के बजाय बढ़ा रहा है।
- बिना झिझक पेशेवर मदद लें: सामाजिक जुड़ाव को साल के अंत में जोड़े जाने वाले 'वेलनेस' विकल्प की तरह नहीं, बल्कि जीवन की बुनियादी जरूरत और सामाजिक ढांचे का हिस्सा समझना चाहिए। संस्थानों और व्यवसायों को भी रिटेंशन और राजस्व की तरह लोगों के बीच जुड़ाव को पहले से सोच-समझकर अपनी व्यवस्था में शामिल करना चाहिए।
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