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लंग कैंसर का पता चलते ही क्या होता है? डॉक्टर ने बताया इलाज का पूरा प्रोसेस और शुरुआती संकेत

Lung Cancer Diagnosis and Treatment: लंग कैंसर का नाम सुनते ही मरीज और उसके परिवार के लिए स्थिति बेहद चुनौतीपूर्ण हो जाती है। हालांकि, विशेषज्ञों का कहना है कि बीमारी की पुष्टि होने के बाद इलाज एक तय चिकित्सा प्रक्रिया के तहत आगे बढ़ता है। गाजियाबाद के यशोदा हॉस्पिटल के ऑन्कोलॉजिस्ट और डायरेक्टर डॉ. मनीष सिंघल के अनुसार, शुरुआती दिनों में मरीजों को लगता है कि सब कुछ अनिश्चित है, जबकि वास्तव में डॉक्टर जांच, स्टेजिंग और मरीज की स्थिति के अनुसार उपचार की स्पष्ट योजना बनाते हैं।

भारत में देर से हो रही है पहचान

डॉ. सिंघल के मुताबिक, लंग कैंसर भारतीय पुरुषों में सबसे आम कैंसर है। नेशनल कैंसर रजिस्ट्री प्रोग्राम के अनुमान के अनुसार, 2025 में देश में इसके करीब 1.11 लाख नए मामले सामने आ सकते हैं। सबसे बड़ी चुनौती यह है कि भारत में लगभग आधे मरीजों में बीमारी का पता तब चलता है, जब कैंसर फेफड़ों से आगे फैल चुका होता है, जिससे इलाज के विकल्प सीमित हो जाते हैं।

उन्होंने बताया कि धूम्रपान सबसे बड़ा जोखिम कारक है और भारत में करीब 10 करोड़ वयस्क धूम्रपान करते हैं। फिर भी, लगभग 50% मरीज ऐसे होते हैं जिन्होंने कभी धूम्रपान नहीं किया। इसके पीछे वायु प्रदूषण, सेकेंड-हैंड स्मोक, रेडॉन गैस, कार्यस्थल पर हानिकारक पदार्थों का संपर्क और आनुवंशिक कारण जिम्मेदार हो सकते हैं। यह प्रवृत्ति महिलाओं और युवाओं में भी तेजी से देखी जा रही है। भारत में निदान की औसत उम्र लगभग 55 वर्ष है, जो पश्चिमी देशों की तुलना में करीब 10 वर्ष कम है।

किन लक्षणों को न करें नजरअंदाज?

डॉ. सिंघल ने लगातार खांसी, बिना वजह वजन घटना, सीने में दर्द और खून के साथ खांसी जैसे लक्षणों को गंभीरता से लेने की सलाह दी। उनका कहना है कि अधिक जोखिम वाले लोगों में लो-डोज CT स्कैन से बीमारी का शुरुआती चरण में पता लगाया जा सकता है, जब इलाज सबसे अधिक प्रभावी होता है।

बायोमार्कर टेस्ट से तय होता है इलाज

बीमारी की पुष्टि के बाद डॉक्टर यह जांचते हैं कि कैंसर नॉन-स्मॉल सेल है या स्मॉल सेल, उसका स्टेज क्या है और मरीज की समग्र स्वास्थ्य स्थिति कैसी है। डॉ. सिंघल के अनुसार, पिछले एक दशक में सबसे बड़ा बदलाव ट्यूमर की जैविक संरचना को समझने में आया है। बायोमार्कर टेस्टिंग के जरिए EGFR, ALK और ROS1 जैसे जीन म्यूटेशन की पहचान की जाती है, जो खासतौर पर धूम्रपान न करने वालों और कम उम्र के मरीजों में अधिक पाए जाते हैं। इससे केवल कीमोथेरेपी के बजाय लक्षित दवाओं (टार्गेटेड थेरेपी) का विकल्प मिल सकता है।

आज लंग कैंसर के इलाज में सर्जरी, रेडियोथेरेपी, टार्गेटेड थेरेपी, इम्यूनोथेरेपी और सहायक देखभाल का संयोजन अपनाया जाता है।

इलाज के साथ सपोर्ट भी जरूरी

डॉ. सिंघल का कहना है कि बेहतर परिणाम के लिए पोषण, नियमित व्यायाम, लक्षणों की निगरानी और मानसिक परामर्श भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं। भविष्य में लिक्विड बायोप्सी, एडवांस्ड मॉलिक्यूलर डायग्नोस्टिक्स और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) जैसी तकनीकें कैंसर की अधिक सटीक पहचान और निगरानी में मदद कर रही हैं।

उन्होंने बताया कि दुनिया भर में 2022 में लंग कैंसर के करीब 25 लाख नए मामले और 18 लाख मौतें दर्ज की गईं। उनका कहना है कि यदि मरीज अपने कैंसर के प्रकार, स्टेज और बायोमार्कर टेस्टिंग के बारे में जानकारी रखे और डॉक्टरों के संपर्क में बना रहे, तो वह इलाज के बेहतर विकल्प चुनने में सक्षम हो सकता है।

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