Iran US Israel War
Iran US Israel War: मिडिल ईस्ट की राजनीति एक बार फिर विस्फोटक मोड़ पर पहुंच गई है। ईरान और इजराइल के बीच दशकों पुराना तनाव उस वक्त खुली जंग में बदल गया, जब अमेरिका सीधे इस टकराव में कूद पड़ा। डोनाल्ड ट्रंप के नेतृत्व में अमेरिका की एंट्री के बाद हालात तेजी से बिगड़े और क्षेत्र में बड़े सैन्य संघर्ष की शुरुआत हो गई।
ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई की इजराइली-अमेरिकी संयुक्त हमले में मौत की खबरों के बाद ईरान ने भी जवाबी कार्रवाई तेज कर दी। मिडिल ईस्ट के कई देशों में स्थित अमेरिकी सैन्य ठिकानों को निशाना बनाया गया। इसके बावजूद सबसे चौंकाने वाली बात यह रही कि मुस्लिम बहुल देशों ने ईरान के समर्थन में खुलकर आगे आने से दूरी बना ली।
मध्य पूर्व में सऊदी अरब, तुर्किए, जॉर्डन, बहरीन, लेबनान सहित करीब 16 मुस्लिम देश हैं। लेकिन इतने बड़े संकट के समय भी ईरान को कोई ठोस समर्थन नहीं मिला। अंतरराष्ट्रीय विश्लेषकों के मुताबिक, इसके पीछे धार्मिक, राजनीतिक और सामरिक कारणों का जटिल जाल है।
विशेषज्ञों का मानना है कि ईरान लंबे समय से हिज़्बुल्लाह, हमास और हूथी जैसे सशस्त्र संगठनों को समर्थन देता रहा है। साथ ही फिलिस्तीनी इस्लामिक जिहाद जैसे गुटों को मदद के आरोप भी ईरान पर लगते रहे हैं। इन संगठनों की गतिविधियों ने पूरे क्षेत्र में अस्थिरता बढ़ाई है, जिससे कई मुस्लिम देश खुद को असुरक्षित महसूस करते हैं।
इसी कारण सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात और जॉर्डन जैसे देशों ने न सिर्फ ईरान से दूरी बनाई, बल्कि अपने एयरस्पेस को इजराइल के लिए खुला रखकर अप्रत्यक्ष सहयोग भी दिया।
मध्य पूर्व की सबसे गहरी दरार शिया-सुन्नी विवाद है। ईरान खुद को शिया मुस्लिम नेतृत्व का केंद्र मानता है, जबकि सऊदी अरब सुन्नी इस्लाम का प्रभावशाली चेहरा है। दोनों देशों के बीच नेतृत्व की यह प्रतिस्पर्धा दशकों से चली आ रही है। सऊदी अरब को आशंका है कि ईरान का बढ़ता प्रभाव पूरे क्षेत्र में शक्ति संतुलन बदल सकता है यही डर उसे ईरान के खिलाफ खड़ा करता है।
रिपोर्टों के मुताबिक, अधिकतर मुस्लिम देश इजराइल-ईरान युद्ध के विस्तार का विरोध तो करते हैं, लेकिन खुलकर ईरान के समर्थन में नहीं आना चाहते। वजह है आपसी प्रतिद्वंद्विता, परोक्ष युद्ध और कई देशों के भीतर चल रहे गृह संघर्ष।
ईरान की जवाबी कार्रवाई में जब सऊदी अरब सहित कई देशों में अमेरिकी सैन्य ठिकानों को निशाना बनाया गया, तो मुस्लिम वर्ल्ड लीग खुलकर सामने आई। संगठन ने बयान जारी कर कहा कि ऐसे हमले क्षेत्र की शांति, स्थिरता और सुरक्षा के लिए गंभीर खतरा हैं।
पाकिस्तान ने अमेरिका-इजराइल हमले की निंदा की और ईरान के आत्मरक्षा के अधिकार की बात कही, लेकिन सैन्य मदद से दूरी बनाए रखी। चीन ने सीज़फायर की अपील करते हुए बातचीत पर ज़ोर दिया। तुर्किए ने दोनों पक्षों की कार्रवाइयों की आलोचना करते हुए मुस्लिम दुनिया से युद्ध को और न फैलने देने की अपील की।
कुल मिलाकर, ईरान आज कूटनीतिक रूप से घिरा हुआ नजर आ रहा है। धार्मिक मतभेद, क्षेत्रीय राजनीति और सुरक्षा चिंताओं ने मुस्लिम देशों को एकजुट होने से रोक दिया है। मिडिल ईस्ट में यह युद्ध अब सिर्फ हथियारों की नहीं, बल्कि भरोसे और नेतृत्व की भी लड़ाई बन चुका है।
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