Friday, Sep 11

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Mirzapur The Movie Review: डायलॉग और स्टारकास्ट दमदार, लेकिन कमजोर कहानी ने फीका किया पूरा खेल

‘मिर्जापुर’ वेब सीरीज ने OTT पर अपनी अलग पहचान बनाई और इसके किरदार दर्शकों के बीच कल्ट बन गए। ऐसे में जब इस फ्रेंचाइजी को फिल्म के रूप में बड़े पर्दे पर लाने का फैसला हुआ, तो फैंस की उम्मीदें भी काफी बढ़ गईं। 4 सितंबर 2026 को रिलीज हुई ‘मिर्जापुर: द मूवी’ हालांकि उन उम्मीदों पर पूरी तरह खरी नहीं उतरती।

फिल्म में पंकज त्रिपाठी, अली फजल और दिव्येंदु जैसे कलाकारों की मौजूदगी और उनके बीच होने वाली तीखी नोकझोंक मनोरंजन करती है। कई डायलॉग थिएटर में तालियां और सीटियां भी बटोरते हैं। लेकिन कमजोर स्क्रीनप्ले, अनुमानित कहानी और उतना प्रभावशाली न लगने वाला मुख्य विलेन फिल्म की सबसे बड़ी कमियां बन जाते हैं।

कहानी में क्या है?

फिल्म एक बार फिर पूर्वांचल की सत्ता और मिर्जापुर की गद्दी के इर्द-गिर्द घूमती है। कालीन भइया यानी अखंडानंद त्रिपाठी के साम्राज्य पर कब्जा करने की कोशिश इस बार बब्बन यादव करता है।

बब्बन यादव का लक्ष्य कालीन भइया को रास्ते से हटाकर मिर्जापुर की सत्ता अपने हाथ में लेना है। इसके लिए वह साजिश रचता है और कहानी में टकराव शुरू होता है।

समस्या यह है कि फिल्म की कहानी में ऐसा कुछ नया नहीं दिखाई देता जो दर्शकों को लगातार उत्सुक बनाए रखे। ‘मिर्जापुर’ की दुनिया के लोकप्रिय किरदारों को बड़े पर्दे पर लाया गया है, लेकिन उनके लिए उतनी मजबूत नई कहानी तैयार नहीं की गई।

जिन लोगों ने वेब सीरीज नहीं देखी है, उनके लिए शुरुआती हिस्से में किरदारों और उनके रिश्तों को समझना थोड़ा मुश्किल हो सकता है। वहीं पुराने फैंस के लिए भी कहानी में बड़े सरप्राइज या चौंकाने वाले ट्विस्ट की कमी महसूस होती है।

एक्टिंग बनी फिल्म की सबसे बड़ी ताकत

फिल्म की सबसे मजबूत कड़ी इसकी स्टारकास्ट है। कालीन भइया के किरदार में पंकज त्रिपाठी एक बार फिर अपने शांत लेकिन खतरनाक अंदाज से प्रभावित करते हैं।

मुन्ना भइया के रूप में दिव्येंदु और गुड्डू पंडित के किरदार में अली फजल की जोड़ी फिल्म को सबसे ज्यादा ऊर्जा देती है। दोनों के बीच होने वाली नोकझोंक और वन-लाइनर्स कई मौकों पर फिल्म की कमजोर कहानी पर भारी पड़ते हैं।

दिव्येंदु का मुन्ना वाला अंदाज और अली फजल का आक्रामक गुड्डू किरदार फैंस को पसंद आ सकता है।

हालांकि, विलेन के स्तर पर फिल्म उतना प्रभाव पैदा नहीं कर पाती। बब्बन यादव के किरदार में रवि किशन से जिस तरह के खौफ और दबदबे की उम्मीद की जाती है, वह पूरी तरह स्क्रीन पर नजर नहीं आता। इसके मुकाबले भैरव सिंह कर्णावट के रूप में सुशांत सिंह ज्यादा प्रभावशाली दिखाई देते हैं।

रसिका दुग्गल ने बीना त्रिपाठी और श्वेता त्रिपाठी ने गोलू गुप्ता के किरदार में अपनी भूमिका को अच्छी तरह निभाया है। वहीं बबलू पंडित के रूप में जीतेंद्र कुमार भी अपने किरदार में प्रभाव छोड़ते हैं।

निर्देशन में बिखर गया कहानी का असर

‘मिर्जापुर’ जैसे लोकप्रिय OTT शो को करीब ढाई घंटे की फिल्म में बदलना अपने आप में बड़ी चुनौती थी। फिल्म के निर्देशक ने वेब सीरीज की पहचान बने हिंसा, गालियों और दमदार डायलॉग्स को बड़े पर्दे पर बनाए रखने की कोशिश की है, लेकिन कहानी को उसी स्तर की मजबूती नहीं मिल पाती।

फिल्म की रफ्तार एक जैसी नहीं रहती। कुछ हिस्से काफी तेजी से आगे बढ़ते हैं, जबकि कई जगह कहानी जरूरत से ज्यादा खिंचती हुई महसूस होती है।

कई सीन में किरदारों की एंट्री और उनके बीच की अकड़ वाली बातचीत पर काफी जोर दिया गया है। इससे उनका स्वैग तो दिखाई देता है, लेकिन मुख्य कहानी पीछे छूट जाती है।

एक क्राइम थ्रिलर में जिस तरह का लगातार तनाव और सस्पेंस होना चाहिए, वह फिल्म में पर्याप्त नजर नहीं आता। हालांकि क्लाइमेक्स से पहले के आखिरी करीब 20 मिनट फिल्म को काफी बेहतर गति देते हैं, जब प्रमुख किरदार एक ही जगह पर टकराते हैं।

सिनेमैटोग्राफी शानदार

तकनीकी स्तर पर फिल्म काफी बेहतर दिखाई देती है। कैमरा वर्क के जरिए पूर्वांचल का माहौल, गलियां, घाट और ग्रामीण परिवेश बड़े पर्दे पर प्रभावी तरीके से पेश किया गया है।

एक्शन और गैंग वॉर वाले सीन्स में वाइड शॉट्स और स्लो-मोशन का इस्तेमाल सिनेमाई प्रभाव बढ़ाता है। फिल्म का डार्क और रॉ विजुअल टोन भी ‘मिर्जापुर’ की क्राइम वाली दुनिया के साथ अच्छी तरह मेल खाता है।

इस लिहाज से बड़े पर्दे पर फिल्म देखना OTT पर देखने के मुकाबले ज्यादा प्रभावशाली अनुभव दे सकता है।

बैकग्राउंड म्यूजिक दमदार, गाने कमजोर

फिल्म का बैकग्राउंड स्कोर कई कमजोर सीन्स को संभालने का काम करता है। जैसे ही ‘मिर्जापुर’ का जाना-पहचाना थीम सुनाई देता है, थिएटर में दर्शकों की प्रतिक्रिया देखने लायक होती है।

हालांकि गानों की बात करें तो फिल्म का म्यूजिक एल्बम कोई खास छाप नहीं छोड़ता। ऐसा कोई गाना नहीं है जो फिल्म खत्म होने के बाद लंबे समय तक याद रहे। ज्यादातर गाने कहानी का हिस्सा भर लगते हैं और थ्रिल को बहुत ज्यादा आगे नहीं बढ़ाते।

कहां चूक गई फिल्म?

सबसे बड़ी परेशानी कहानी की है। जिस फ्रेंचाइजी ने OTT पर अपने ट्विस्ट और अप्रत्याशित घटनाओं से दर्शकों को चौंकाया था, उसी से फिल्म में ज्यादा रोमांच की उम्मीद थी। लेकिन यहां कहानी काफी हद तक पहले से अनुमान लगाने लायक लगती है।

दूसरी समस्या मुख्य विलेन की है। कालीन भइया, गुड्डू और मुन्ना जैसे स्थापित किरदारों के सामने बब्बन यादव उतना मजबूत खतरा महसूस नहीं होता। इससे फिल्म का केंद्रीय संघर्ष भी कमजोर पड़ जाता है।

फिल्म का एक और बड़ा नुकसान नए दर्शकों को लेकर है। जिन्होंने पहले ‘मिर्जापुर’ नहीं देखी है, उनके लिए किरदारों और पुराने संदर्भों को समझना मुश्किल हो सकता है।

इसके अलावा रनटाइम भी कुछ जगह लंबा महसूस होता है। अगर फिल्म को करीब 20 मिनट छोटा किया जाता, तो इसकी गति और बेहतर हो सकती थी।

Final Verdict: देखें या नहीं?

‘मिर्जापुर: द मूवी’ अपनी स्टारकास्ट और फ्रेंचाइजी की लोकप्रियता के दम पर कई जगह मनोरंजन करती है, लेकिन मजबूत कहानी और प्रभावी थ्रिल की कमी इसे एक शानदार क्राइम फिल्म बनने से रोक देती है।

पंकज त्रिपाठी, अली फजल और दिव्येंदु की परफॉर्मेंस फिल्म की सबसे बड़ी ताकत हैं। मुन्ना और गुड्डू के बीच के डायलॉग फैंस को खास तौर पर पसंद आ सकते हैं। वहीं शानदार सिनेमैटोग्राफी और बैकग्राउंड स्कोर बड़े पर्दे के अनुभव को बेहतर बनाते हैं।

लेकिन अगर आप एक नई, तेज और लगातार रोमांच बनाए रखने वाली क्राइम थ्रिलर देखने जा रहे हैं, तो फिल्म आपको निराश कर सकती है। हां, अगर आप ‘मिर्जापुर’ के कट्टर फैन हैं और अपने पसंदीदा किरदारों को थिएटर में बड़े पर्दे पर देखना चाहते हैं, तो इसे एक बार मौका दिया जा सकता है।