Paryushana Parva 2026 Keshlonch: जैन धर्म में पर्युषण पर्व को आत्मसंयम, तपस्या और आध्यात्मिक साधना का महत्वपूर्ण अवसर माना जाता है। इस दौरान जैन अनुयायी उपवास, ध्यान, प्रार्थना और आत्मचिंतन पर विशेष ध्यान देते हैं। जैन साधु-साध्वियों के जीवन में त्याग और संयम का महत्व और भी अधिक होता है। इसी साधना से जुड़ी एक कठिन परंपरा है केशलोचन, जिसमें सिर और चेहरे के बाल हाथों से हटाए जाते हैं। यह प्रक्रिया केवल बाहरी रूप बदलने का माध्यम नहीं, बल्कि मोह और भौतिक आकर्षण से दूरी बनाने का प्रतीक मानी जाती है।
क्या होता है केशलोचन
केशलोचन को केश लुंचन भी कहा जाता है। इसका अर्थ है बालों को हाथों से उखाड़ना। जैन परंपरा में जब कोई व्यक्ति सांसारिक जीवन छोड़कर साधु या साध्वी के रूप में दीक्षा लेता है, तब इस प्रक्रिया का विशेष महत्व होता है। केशलोचन के दौरान साधु या साध्वी अपने सिर और चेहरे के बालों को हाथों से हटाते हैं। कुछ परंपराओं में वरिष्ठ साधु भी इसमें सहायता करते हैं। इस दौरान धार्मिक मंत्रों और वचनों का पाठ किया जाता है। यह प्रक्रिया व्यक्ति के सांसारिक जीवन से दूरी बनाने और आत्मसंयम के मार्ग पर आगे बढ़ने का प्रतीक मानी जाती है।
कैंची या ब्लेड का इस्तेमाल क्यों नहीं
केशलोचन की सबसे खास बात यह है कि इसमें बाल हटाने के लिए कैंची, ब्लेड या किसी अन्य औजार का इस्तेमाल नहीं किया जाता। जैन मान्यताओं के अनुसार, इसके पीछे अहिंसा और त्याग की भावना जुड़ी है। एक मान्यता यह भी है कि औजारों के इस्तेमाल से त्वचा पर मौजूद सूक्ष्म जीवों को नुकसान पहुंच सकता है। इसके अलावा जैन धर्म में बालों और सुंदरता को शरीर के प्रति मोह से जोड़कर देखा जाता है। इसलिए बालों को स्वयं हटाना बाहरी रूप, शरीर और सौंदर्य के प्रति लगाव कम करने का प्रतीक माना जाता है।
इतनी पीड़ा सहकर क्यों करते हैं यह साधना
बालों को जड़ से हटाने के कारण केशलोचन के दौरान दर्द होना स्वाभाविक है। इसके बावजूद जैन साधु इसे धैर्य और सहनशीलता के साथ पूरा करते हैं। जैन परंपरा में इसे शारीरिक असुविधा पर मन के नियंत्रण की परीक्षा भी माना जाता है। इस साधना का उद्देश्य सुख-दुख, आराम और पीड़ा जैसी शारीरिक स्थितियों से ऊपर उठकर मन को संयमित रखना है। साधु जीवन में बाहरी सुविधाओं की जगह आत्मअनुशासन, त्याग और आध्यात्मिक उन्नति को महत्व दिया जाता है।
दीक्षा और पर्युषण पर्व में महत्व
दीक्षा के समय केशलोचन व्यक्ति के पुराने सांसारिक जीवन को पीछे छोड़ने का प्रतीक माना जाता है। यह साधु या साध्वी के उस संकल्प को दर्शाता है, जिसमें वह भौतिक सुख-सुविधाओं और शरीर के प्रति मोह से दूरी बनाने का निर्णय लेता है। जैन परंपरा में केशलोचन साल में एक या दो बार किए जाने की मान्यता बताई जाती है। हालांकि, इसकी प्रक्रिया और समय अलग-अलग जैन संप्रदायों में कुछ भिन्न हो सकते हैं।
बाहर से देखने पर केशलोचन एक कठिन और पीड़ादायक प्रक्रिया लग सकती है, लेकिन जैन साधना में इसका अर्थ इससे कहीं गहरा है। यह त्याग, अहिंसा, वैराग्य, धैर्य और आत्मसंयम का प्रतीक है। जैन साधु-साध्वियों के लिए इसका उद्देश्य बाहरी सुंदरता नहीं, बल्कि आत्मिक अनुशासन और आध्यात्मिक साधना को महत्व देना है।
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