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पैलेट गन फिर विवादों में, प्रदर्शनकारियों की आंखों और चेहरे पर गंभीर चोटों ने उठाए सवाल

by | Jul 23, 2026 | Others

Pellet Gun Injuries in India Protests: शिक्षा मंत्री के इस्तीफे की मांग को लेकर जारी प्रदर्शनों के बीच पैलेट गन के इस्तेमाल ने एक बार फिर बहस छेड़ दी है। एक कारतूस में 500 से 600 तक धातु या रबर के छर्रे हो सकते हैं, जो करीब 1,000 फीट प्रति सेकंड (305 मीटर प्रति सेकंड) की रफ्तार से निकलकर बड़े क्षेत्र में फैलते हैं। पुलिस इसे भीड़ नियंत्रण का हथियार मानती है, लेकिन कई मामलों में इससे गंभीर चोट और स्थायी विकलांगता तक हो सकती है।

साहिल, 25 वर्षीय शेख मंसूरी (गुरुग्राम) और 21 वर्षीय साक्षी जैसे प्रदर्शनकारियों की चोटों ने इसके खतरों को सामने रखा है। विशेषज्ञ पैलेट गन को नॉन-लीथल मानते हैं, लेकिन गलत इस्तेमाल को जानलेवा भी बता रहे हैं।

पैलेट गन की तकनीकी विशेषताएं

पैलेट गन एक तरह की राइफल है, जिससे मेटल या रबर पैलेट से भरे कारतूस दागे जाते हैं। SOP के अनुसार इसे कम से कम 500 फीट की दूरी से और कमर के नीचे निशाना लगाकर चलाया जाना चाहिए। हालांकि, प्रदर्शनों में अक्सर इन नियमों का पालन नहीं हो पाता। नतीजतन चेहरे, आंखों और ऊपरी शरीर पर गंभीर चोटें आती हैं। धातु के छर्रे गहरी चोट पहुंचा सकते हैं, जबकि रबर पैलेट भी तेज दर्द और सूजन का कारण बनते हैं।

कश्मीर से दिल्ली तक इस्तेमाल

भारत में पैलेट गन का सबसे अधिक इस्तेमाल जम्मू-कश्मीर में पत्थरबाजी रोकने के लिए हुआ है। 2016-17 के आंदोलनों में हजारों लोग घायल हुए और कई युवाओं की आंखों की रोशनी प्रभावित हुई, जबकि कुछ के चेहरे पर स्थायी निशान रह गए।

अब दिल्ली में छात्र और अन्य प्रदर्शनकारी भी इसके शिकार होने का दावा कर रहे हैं। परीक्षा अनियमितताओं के खिलाफ आंदोलन में शेख मंसूरी के चेहरे पर सात पैलेट लगे, जिनमें नाक, माथे, दोनों आंखें और गाल शामिल हैं। उन्हें लेडी हार्डिंग मेडिकल कॉलेज में सर्जरी करानी पड़ी और आगे भी इलाज की जरूरत है।

जंतर-मंतर के पास घायल 21 वर्षीय साक्षी को राम मनोहर लोहिया अस्पताल में वेंटिलेटर से हटा दिया गया है। इन मामलों से स्पष्ट है कि पैलेट चोटें केवल तत्काल दर्द तक सीमित नहीं रहतीं। आंखों में छर्रे अंधेपन, जबकि चेहरे पर चोट स्थायी शारीरिक नुकसान और मानसिक आघात का कारण बन सकती है।

पुलिस और मानवाधिकार संगठनों की अलग राय

पुलिस पैलेट गन को गोली की तुलना में कम घातक भीड़ नियंत्रण विकल्प मानती है। वहीं मानवाधिकार संगठन और चिकित्सक इसे खतरनाक बताते हैं। कम दूरी या गलत निशाने से गंभीर चोट लग सकती है। SOP में 500 फीट की दूरी और कमर के नीचे निशाना लगाने की शर्त के बावजूद प्रदर्शन के दौरान भीड़ करीब होने से नियमों का पालन मुश्किल हो जाता है। इससे इसके इस्तेमाल को लेकर कानूनी और नैतिक सवाल भी उठते हैं।

इलाज भी चुनौतीपूर्ण

पैलेट शरीर में गहराई तक धंस सकते हैं और सर्जरी के दौरान उन्हें निकालना मुश्किल होता है। आंखों में चोट से कॉर्निया को नुकसान और रेटिना डिटैचमेंट जैसी समस्याएं हो सकती हैं। कई मामलों में एक से अधिक सर्जरी की जरूरत पड़ती है और पूरी तरह ठीक होना मुश्किल हो सकता है।

विशेषज्ञों का सुझाव है कि पुलिस को वॉटर कैनन, आंसू गैस और अन्य कम घातक विकल्पों पर अधिक ध्यान देना चाहिए। पैलेट गन का इस्तेमाल केवल बेहद जरूरी परिस्थितियों में कड़े SOP के तहत होना चाहिए। जम्मू-कश्मीर के अनुभवों से सीख लेते हुए इसके इस्तेमाल को लेकर देशभर में स्पष्ट और सख्त दिशानिर्देश बनाए जाने की मांग भी उठ रही है।

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