Wednesday, Sep 09

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धरती पर ‘सूरज’ बनाने की दौड़ में भारत की एंट्री! PRAGYA ने पहली बार बनाया प्लाज्मा

Pranos Fusion PRAGYA plasma: भारत में न्यूक्लियर फ्यूजन रिसर्च को लेकर प्राइवेट सेक्टर ने अहम कदम बढ़ाया है। बेंगलुरु की स्टार्टअप प्रनोस फ्यूजन ने अपने टोकामक PRAGYA में पहली बार प्लाज्मा तैयार किया है। करीब 40 सेंटीमीटर रेडियस वाली इस मशीन को कंपनी ने लगभग 8 महीने में बनाया है। इसका इस्तेमाल प्लाज्मा को नियंत्रित करने, उसकी जांच और फ्यूजन से जुड़ी तकनीकों के परीक्षण के लिए किया जाएगा।

क्या है टोकामक और PRAGYA का काम?

टोकामक ऐसी मशीन है, जिसमें बेहद गर्म प्लाज्मा को चुंबकीय ताकत से नियंत्रित किया जाता है। फ्यूजन प्रक्रिया में छोटे परमाणुओं को जोड़कर ऊर्जा पैदा करने की कोशिश होती है। यही प्रक्रिया सूर्य में भी ऊर्जा का स्रोत है। PRAGYA का उद्देश्य फिलहाल बिजली बनाना नहीं, बल्कि एक टेस्ट प्लेटफॉर्म के तौर पर प्रयोग करना है। कंपनी इसे करीब 20 साल तक चलाने और हर साल लगभग 3,000 प्लाज्मा शॉट लेने की योजना बना रही है। यानी रोजाना करीब 10-12 प्रयोग। इससे जुटा डेटा भविष्य के बड़े फ्यूजन रिएक्टरों के विकास में मदद कर सकता है।

प्लाज्मा कंट्रोल से HTS मैग्नेट तक रिसर्च

PRAGYA पर प्लाज्मा नियंत्रण, टोकामक डिजाइन, कंट्रोल सिस्टम और डायग्नोस्टिक तकनीकों पर काम होगा। कंपनी हाई टेम्परेचर सुपरकंडक्टिंग (HTS) मैग्नेट भी विकसित करेगी, जिनका इस्तेमाल फ्यूजन मशीनों में प्लाज्मा नियंत्रित करने में किया जा सकता है।

2030 तक नेट एनर्जी गेन रिएक्टर का लक्ष्य

प्रनोस फ्यूजन का लक्ष्य 2027 तक HTS मैग्नेट को चालू करना और 2030 तक PraniQ नाम का नेट एनर्जी गेन रिएक्टर बनाना है। इसका मतलब ऐसी स्थिति से है, जहां फ्यूजन से मिलने वाली ऊर्जा उसे चलाने में लगने वाली ऊर्जा से अधिक हो। हालांकि, यह कंपनी का लक्ष्य है और PRAGYA खुद नेट एनर्जी गेन रिएक्टर नहीं है।

फ्यूजन वैज्ञानिक तैयार करने पर भी जोर

कंपनी PRAGYA के जरिए तकनीकी प्रयोगों के साथ फ्यूजन वैज्ञानिकों और प्लाज्मा फिजिसिस्टों को तैयार करना चाहती है। लंबे समय तक चलने वाले प्रयोग छात्रों और वैज्ञानिकों को फ्यूजन तकनीक समझने और उस पर काम करने का अवसर देंगे। फिलहाल PRAGYA में प्लाज्मा बनना शुरुआती उपलब्धि है, जबकि आगे के प्रयोग कंपनी के बड़े लक्ष्यों की दिशा तय करेंगे।

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