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15 लाख करोड़ रुपये के कथित फर्जी रेवेन्यू पर सेबी की बड़ी कार्रवाई

Rajesh Exports Fake Revenue: Rajesh Exporters का नाम कभी भारत के गोल्ड कारोबार में एक बड़े ब्रांड के रूप में जाना जाता था। उनकी कंपनी राजेश एक्सपोर्ट्स को दुनिया की प्रमुख गोल्ड रिफाइनरियों में से एक है। लेकिन जून 2026 में सेबी की जांच रिपोर्ट सामने आने के बाद यह प्रतिष्ठित नाम एक बड़े वित्तीय विवाद के केंद्र में आ गया। रिपोर्ट में आरोप लगाया गया कि कंपनी ने करीब 15 लाख करोड़ रुपये का रेवेन्यू  बढ़ा-चढ़ाकर दिखाया।

क्या है Rajesh Exporters और क्यों थी इतनी चर्चित?

1989 में स्थापित राजेश एक्सपोर्ट्स खुद को सोने की रिफाइनिंग, आभूषण निर्माण और निर्यात के क्षेत्र में वैश्विक लीडर बताती रही है। बेंगलुरु स्थित कंपनी का दावा था कि वह हर साल लगभग 500 टन सोने का रिफाइनिंग कार्य करती है। एक समय कंपनी का मार्केट कैप हजारों करोड़ रुपये था, लेकिन 2022 में 900 रुपये तक पहुंचा इसका शेयर 2026 आते-आते 30 रुपये से नीचे आ गया। इसी गिरावट के पीछे छिपे कारणों का खुलासा सेबी की जांच में हुआ।

सेबी ने कैसे पकड़ा 15 लाख करोड़ रुपये का कथित खेल?

सेबी की जांच के अनुसार, कंपनी ने फर्जी खरीद-बिक्री के जरिए अपने राजस्व के आंकड़ों को कृत्रिम रूप से बढ़ाया। वित्त वर्ष 2023-24 में कंपनी ने 3.41 लाख करोड़ रुपये के राजस्व का दावा किया था, जबकि सेबी का कहना है कि इसमें से लगभग 98 प्रतिशत हिस्सा केवल कागजों तक सीमित था।

जांच में सामने आया कि एक ही माल को कई बार खरीदने और बेचने का रिकॉर्ड दिखाया जाता था। इसके लिए शेल कंपनियों और संबंधित पक्षों का इस्तेमाल किया गया और बिना वास्तविक लेनदेन के केवल बिल तैयार किए गए। 2014-15 से 2023-24 तक के रिकॉर्ड की जांच के बाद सेबी ने करीब 15 लाख करोड़ रुपये के कथित फर्जी राजस्व का पता लगाया। इसके बाद राजेश मेहता और कंपनी के अन्य शीर्ष अधिकारियों पर बाजार से प्रतिबंध लगाने के साथ भारी जुर्माना भी लगाया गया।

म्यूचुअल फंडों ने क्यों बनाई दूरी?

इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, पिछले एक दशक में अधिकांश घरेलू म्यूचुअल फंडों ने राजेश एक्सपोर्ट्स से दूरी बनाए रखी। कंपनी के भारी राजस्व और बेहद कम मुनाफे के बीच का अंतर फंड मैनेजरों के लिए चिंता का विषय था। शेयर मूल्य और वास्तविक प्रदर्शन में अंतर ने भी संदेह पैदा किया। हालांकि कुछ छोटे फंड और पोर्टफोलियो मैनेजमेंट सर्विसेज ने निवेश किया, लेकिन बड़े संस्थागत निवेशकों का रुख नकारात्मक रहा।

फिर LIC ने क्यों बढ़ाई अपनी हिस्सेदारी?

जहां अधिकांश म्यूचुअल फंड कंपनी से दूर रहे, वहीं LIC ने अपनी हिस्सेदारी बढ़ाकर लगभग पांच गुना करते हुए 10.8 प्रतिशत तक पहुंचा दी। माना जा रहा है कि LIC ने लंबी अवधि के नजरिए से निवेश किया होगा और कंपनी के मूल कारोबार से बेहतर प्रदर्शन की उम्मीद की होगी।

कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि संभव है कि कंपनी के वित्तीय दावों की पर्याप्त जांच न की गई हो। वहीं कुछ लोग यह भी सवाल उठा रहे हैं कि क्या निवेश संबंधी फैसले केवल पेशेवर विश्लेषण पर आधारित थे। हालांकि LIC ने अब तक इस पूरे मामले पर कोई सार्वजनिक प्रतिक्रिया नहीं दी है।

इस मामले का व्यापक असर और आगे की राह

यह मामला भारत में कॉरपोरेट गवर्नेंस और ऑडिट व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े करता है। विशेषज्ञों का कहना है कि यदि कोई कंपनी एक दशक तक इतने बड़े पैमाने पर कथित फर्जी राजस्व दिखाने में सफल रही, तो ऑडिट और निगरानी व्यवस्था की प्रभावशीलता पर भी सवाल उठना स्वाभाविक है।

यह घटनाक्रम छोटे निवेशकों के लिए भी एक महत्वपूर्ण सबक माना जा रहा है, जो अक्सर बड़े नाम और आकर्षक आंकड़ों के आधार पर निवेश करते हैं। वहीं, LIC जैसी सरकारी संस्था के बड़े निवेश ने सार्वजनिक धन की सुरक्षा को लेकर भी बहस छेड़ दी है।

विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले समय में सेबी की जांच और आगे बढ़ सकती है तथा प्रवर्तन निदेशालय (ED) और केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) भी मामले में शामिल हो सकते हैं। राजेश मेहता और उनके सहयोगियों के खिलाफ आपराधिक कार्रवाई की संभावना से भी इनकार नहीं किया जा रहा। यह पूरा मामला भारतीय वित्तीय बाजार के लिए एक बड़ी चेतावनी के रूप में देखा जा रहा है।

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Tanisha Verma

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